महाकुंभ में अनाज बाबा पहुंचे हैं। उन्होंने सिर पर फसल उगा रखी है। मूलरूप से सोनभद्र के रहने वाले बाबा अमरजीत पिछले 14 वर्षों से फसल उगा रहे हैं। मौनी अमावस्या पर प्रसाद बांटेंगे।
महाकुंभ में आने वाले हर एक साधु का अपना एक अलग ही रूप-रंग होता है। ये साधु भगवान की भक्ति में इतना लीन होते हैं कि कई बार कुछ अनोखा कर जाते हैं। ऐसे ही एक साधु महाकुंभ में इन दिनों खूब चर्चा का विषय बने हुए हैं। जी हां, हम बात करे हैं अनाज वाले बाबा।
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ये बाबा पर्यावरण को लेकर बहुत चिंतित है, इसलिए सभी को पर्यावरण के प्रति जागरुक करने के साथ ही अपने सिर पर फसल उगा ली है। मूलरूप से सोनभद्र के मारकुंडी निवासी अनाज वाले बाबा का नाम अमरजीत है। बाबा अमरजीत ने 28 साल पहले सन्यास का जीवन अपना लिया था।
बाबा बताते हैं कि वह हठयोगी है। हठयोगी वो विश्व शांति विश्व कल्याण के लिए कर रहे हैं और जिस तरीके से पेड़ों की कटाई हो रही है। इस तरह का संकल्प लेकर हरियाली का संदेश दे रहा हूं। अपने सिर पर जो चना, गेहूं, बाजरा फसलों को लगाया है।
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उनकी जौ उनके सिर से लगभग एक फीट तक पहुंच चुकी है। जिससे आए दिन दर्द भी होता है। उन्होंने कहा कि, यही तो हठयोगी है और एक संत के अलावा यह कोई नहीं कर सकता है। पिछले करीब 14 वर्ष से वह लगातार इसी तरह का हठयोगी करते आ रहे हैं और अपने सिर पर फसलों को उगा रहे हैं।
प्रसाद ग्रहण करने वाला होगा धन्य
बाबा कहते हैं कि मौनी अमावस्या के दिन यह फसल तैयार हो जाएगी। जिसे वह अपने भक्तों को प्रसाद के रूप मे बांटेंगे। जो इस प्रसाद को ग्रहण करेगा वह धन्य हो जाएगा। वहीं, बाबा के इस अनोखे अंदाज को देख हर कोई सेल्फी ले रहा है। इसके साथ ही सिर पर फसल उगाने का रहस्य भी पूछ रहे हैं।
बाबा भी खुशी से सबको अपने इस संकल्प के बारे में बताते हैं और लोगों से अपील करते हैं कि वह भी हरियाली के प्रति लोगों को जागरूक करें। बाबा कहते हैं कि हरियाली ही जीवन है, पर्यावरण के प्रति लोगों काे जागरूक करने के साथ ही पेड़ पौधों को नहीं काटना चाहिए।
रायबरेली के कबीरा बाबा खोल रहे अहंकार का ताला
कबीरा बाबा लोगों के मन में बसे अहंकार का ताला 20 किलो की चाभी से खोलकर उन्हें नया रास्ता दिखाने के लिए देश भ्रमण पर निकले हैं। चाबी पर लिखा है, हे मानव सत्य न्याय व धर्म के मार्ग पर चलो...मैं आ गया हूं। इनके पास रथ है, जिसमें न कोई इंजन लगा है और न ही घोड़े हैं। बाबा इसे खुद खींचते हैं। बाबा हजारों किमी की यात्रा कर चुके हैं। वह जहां जाते हैं, यादगार के तौर पर एक चाबी बनाकर रथ में रख लेते हैं। यूपी के रायबरेली के चाबी रहने वाले बाबा का नाम हरिश्चंद्र विश्वकर्मा (50) है। ये 16 साल की उम्र में समाज में फैली बुराइयों और नफरत से लड़ने का फैसला कर घर से निकल गए। हरिश्चंद्र कबीरपंथी विचारधारा के थे, इसलिए लोग उन्हें कबीरा बाबा बुलाने लगे थे। अयोध्या से यात्रा कर अब महाकुंभ में पहुंचे हैं।
चाबी वाले बाबा स्वामी विवेकानंद को अपना आदर्श मनाते हैं। इनका कहना है कि अध्यात्म की ओर पूरी दुनिया भाग तो रही है। लेकिन, अध्यात्म कहीं बाहर नहीं है, बल्कि वह इंसान के अंदर ही बसा है। चाबी में आध्यात्म और जीवन का राज छिपा है। इसे लोगों को बताना चाहता हूं। लेकिन, किसी के पास समय नहीं है। अगर किसी को रोककर कुछ कहता हूं तो लोग यह कहकर मुंह फेर लेते हैं कि बाबा मेरे पास छुट्टे पैसे नहीं हैं।