पौष पूर्णिमा के स्नान के साथ कल्पवास का अनुष्ठान सोमवार को शुरू हुआ। श्रद्धालुओं ने गंगा पूजन किया और कल्पवास के अनुशासन का व्रत लिया। इसी के साथ महीने भर का स्नान, दान जप का अनुष्ठान प्रारंभ हो गया। तीर्थ पुरोहितों ने यजमानों को कल्पवास का संकल्प दिलाकर पूजा-अर्चना कराई। कल्पवासियों ने गंगा पूजन के बाद तुलसी का बिरवा लगाया गया और जौ बोया गया। इसी के साथ संगम की रेती पर मास पर्यंत स्नान, दान, ध्यान, प्रवचन का सिलसिला शुरू हो गया।
पौष पूर्णिमा के स्नान पर्व पर सोमवार को संगम समेत गंगा के विभिन्न घाटों पर श्रद्धालुओं ने आस्था की डुबकी लगाई लेकिन भीड़ विगत वर्षों के मुकाबले काफी कम रही। सुबह से शुरू हुआ स्नान का सिलसिला देर शाम तक चलता रहा। स्नानार्थियों ने गंगा में पुण्य की डुबकी लगाई। परिवार के जो लोग घर पर रह गए थे उनके भी नाम से डुबकी लगाई, यथा सामर्थ्य दान दिया गया व घाटियों से चंदन का टीका भी लगवाया।
गंगा स्नान के बाद तट पर हलुआ पूड़ी बनाकर श्रद्धालु मां गंगा को अर्पित करते थे पर इस बार तेज हवा चलने से हलुआ पूड़ी नहीं बनाई गई। अधिकतर लोगों ने मिठाई व बताशा से काम चलाया। दीप जलाने में भी कठिनाई आई।
माघ मास में संकल्प लेने वाले कल्पवासियों का जप, तप, स्नान के साथ षटतिला का अनुशासन भी शुरू हो गया। मास पर्यंत तिल का प्रयोग किया जाएगा। तिलयुक्त जल से स्नान, तिल से तर्पण, उबटन, हवन, यहां तक कि भोजन में भी तिल शामिल होगा। पंडित दिवाकर त्रिपाठी के मुताबिक शिव मंदिर में तिल के तेल का दिया जलाने का विशेष पुण्य है।
आध्यात्मिक नगरी में संतों की वाणी गूंजने लगी है। त्रिवेणी मार्ग स्थित जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के शिविर में उनके उत्तराधिकारी शिष्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कल्पवास के महात्म्य के बारे में बताया। कहा माघ मास में संगम तट पर नियम संयम से रहकर चिंतन मनन करने से तमाम तरह के विकारों का नाश होता है। समाज की उन्नति के लिए यह साधना जरूरी है। इससे युवा पीढ़ी संस्कारित होती है। पुराणों में वर्णित है कि माघ मास में नियम पूर्वक कल्पवास करने से पितर और देव प्रसन्न होते हैं। इससे पहले उन्होंने गंगा स्नानकर कल्पवास का संकल्प लिया और गंगा को प्रदूषण मुक्त कराने का संकल्प दोहराया।
अखिल भारतीय दंडी संन्यासी व्यवस्था समिति के संतों ने गंगा प्रदूषण व गंगाजल की अनुपलब्धता से नाराज होकर पौष पूर्णिमा के स्नान का बहिष्कार किया। दंडी संन्यासी गंगा दर्शन को गए पर स्नान से विरत रहे। समिति के संरक्षक स्वामी महेशाश्रम ने कहा कि गंगा में पर्याप्त स्वच्छ जल उपलब्ध हुए बगैर वे स्नान नहीं करेंगे। समिति के महामंत्री स्वामी ब्रह्माश्रम ने कहा कि स्नान के लिए गंगाजल पाने को आंदोलन होगा।