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प्रतापगढ़: रजवाड़ों के गढ़ में सियासी रसूख और वजूद बचाने का संघर्ष, रोड़ा बने राजा भैया

Thu, 09 May 2019 03:10 AM IST
देव कश्यप चंद्रप्रकाश उपाध्याय, अमर उजाला, प्रतापगढ़
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रत्ना सिंह (कांग्रेस), संगमलाल गुप्ता (भाजपा), अशोक त्रिपाठी (गठबंधन) और अक्षय प्रताप सिंह (जनसत्ता) - फोटो : अमर उजाला
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राजा-रजवाड़ों के जिले प्रतापगढ़ में 2019 के लोकसभा चुनाव में सियासी रसूख और वजूद बचाने की जंग है। जिले की सियासत में मजबूत दखल रखने वाले कुंडा के बाहुबली विधायक व पूर्व मंत्री रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया अपनी पार्टी जनसत्ता दल के साथ सपा-बसपा गठबंधन व भाजपा की राह में रोड़ा बने हैं, तो कांग्रेस ने तीन बार सांसद रहीं रत्ना सिंह को सातवीं बार मैदान में उतारकर मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है।

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2014 के लोकसभा चुनाव में प्रतापगढ़ सीट अपना दल के खाते में थी। मोदी लहर में हरिबंश सिंह यहां से एकतरफा जीत हासिल कर सांसद बने थे। इस बार हरिबंश का टिकट कट गया है और यह सीट भाजपा के पास है। टिकट के लिए भाजपा नेताओं में मची खींचतान के बीच शीर्ष नेतृत्व ने नामांकन से ऐन पहले पार्टी के नेताओं को दरकिनार कर अपना दल से सदर विधायक संगमलाल गुप्ता को प्रत्याशी घोषित कर दिया। गठबंधन में यह सीट बसपा के खाते में गई और पार्टी ने ब्राह्मण चेहरे के रूप में सदर विधानसभा का चुनाव लड़ चुके अशोक त्रिपाठी पर दांव लगाया है। राजा भैया की जनसत्ता पार्टी से उनके करीबी पूर्व सांसद और एमएलसी अक्षय प्रताप सिंह गोपालजी मैदान में हैं। 

सपा-बसपा गठबंधन, जनसत्ता दल और कांग्रेस से सवर्ण प्रत्याशी होने के बाद भाजपा ने यहां पिछड़ा कार्ड खेलते हुए अपनी ही पार्टी के नेताओं को दरकिनार कर अपना दल एस से सदर विधायक संगमलाल गुप्ता को प्रत्याशी बनाया है। भाजपा मोदी मैजिक और राष्ट्रवाद के साथ सवर्ण और पिछड़ी जाति के मतदाताओं को पाले में कर व्यूहरचना में जुटी है, लेकिन पार्टी में भितरघात और आपसी कलह में इसमें बाधा बन रही है। लोकसभा चुनाव की घोषणा से कुछ दिनों पहले ही जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के नाम से नया दल बनाने वाले राजा भैया यहां सभी प्रमुख दलों के लिए चुनौती बने हैं। वह सभी प्रमुख दलों के वोट बैंक में सेंध लगाते नजर आ रहे हैं।
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राजा भैया खुद पार्टी के स्टार प्रचारक हैं और ताबड़तोड़ रैलियां कर रहे हैं। पूर्व विदेश मंत्री राजा दिनेश सिंह की बेटी और तीन बार सांसद रह चुकीं रत्ना सिंह 7वीं बार मैदान में हैं। ब्राह्मण, राजपूत के साथ उन्हें मुस्लिम मतों पर भरोसा है। पिछड़ों को भी अपने पाले में गोलबंद करने के प्रयास में हैं। दरअसल, सपा के जिलाध्यक्ष रहे पट्टी के पूर्व विधायक राम सिंह पटेल ने लोकसभा चुनाव के दौरान सपा छोड़कर कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली। पट्टी विधानसभा में पटेलों की अच्छी खासी तादाद है। राम सिंह को साथ लाकर रत्ना पटेल मतों को अपने पाले में करने की कोशिश में लगी हैं।

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खूब चला वंशवाद, दस बार एक ही परिवार

प्रतापगढ़ संसदीय सीट पर रजवाड़ों का शुरू से दखल रहा है। लोकसभा चुनावों में दस बार राजघरानों ने जीत हासिल की। इसमें सात बार अकेले कालाकांकर राजघराने का कब्जा रहा। चार बार पूर्व विदेश मंत्री राजा दिनेश सिंह और तीन बार उनकी बेटी रत्ना सिंह सांसद बनीं। तीन बार प्रतापगढ़ राजघराने ने संसदीय सीट पर जीत हासिल की। दो बार राजा अजित प्रताप सिंह तो एक बार उनके बेटे अभय प्रताप सिंह सांसद बने।

फिर आमने-सामने हैं राजा भैया और प्रमोद तिवारी
सियासत के दो बड़े चेहरे राजा भैया और प्रमोद तिवारी एक बार फिर आमने-सामने हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस का गठबंधन होने के बाद दोनों नेता एक मंच पर नजर आए थे। लोकसभा चुनाव में राजा भैया अपनी पार्टी के प्रत्याशी अक्षय प्रताप के लिए प्रचार कर रहे हैं तो कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व राज्यसभा सांसद प्रमोद तिवारी ने रत्ना सिंह के पक्ष में पूरी ताकत झोंक रखी है।

गठबंधन और भाजपा ने तेज की राजा भैया की घेराबंदी
प्रतापगढ़ के मतदाता दो सांसदों का चुनाव करते हैं। प्रतापगढ़ संसदीय सीट में पांच विधानसभा रामपुर खास, सदर, पट्टी, रानीगंज और विश्वनाथगंज हैं। जबकि राजा भैया के गढ़ कुंडा और बाबागंज विधानसभा के मतदाता कौशाम्बी के सांसद का चुनाव करते हैं। प्रतापगढ़ और कौशाम्बी दोनों ही सीटों पर राजा भैया के उम्मीदवार मजबूती से लड़ रहे हैं। ऐसे में सपा-बसपा गठबंधन के साथ भाजपा ने भी उनकी घेराबंदी तेज कर दी है।

हाशिए पर मुद्दे, जातिगत लड़ाई में फंसे नेता 
लोकसभा चुनाव में यहां मुद्दे हाशिए पर हैं और नेता पूरी तरह जातिगत लड़ाई में फंसे हैं। रोजगार के नाम पर जिले में कुछ भी नहीं है। आंवला जिले की पहचान है, लेकिन सुविधाएं और प्रोत्साहन न मिलने के कारण किसान इसकी खेती से मुंह मोड़ते जा रहे हैं। सिस्टम की खामियों के चलते आंवला किसानों का सारा मुनाफा बिचौलिए खा जाते हैं। शहर से सटे कटरामेदनीगंज में पूर्व विदेश मंत्री राजा दिनेश सिंह के प्रयास से खुली एटीएल (आॅटो ट्रैक्टर लिमिटेड) फैक्ट्री बंद हो गई है। 1981 में खुली इस कंपनी में 1998 में ताला लग गया। इसमें 3200 कर्मचारी कार्यरत हैं। अभी भी उनका करोड़ों का बकाया है। 
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