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लोकसभा चुनाव : फूलपुर में जातीय समीकरणों पर नजर तो इलाहाबाद में सियासी परिवारों की भी परीक्षा

Wed, 24 Apr 2024 01:01 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

फूलपुर लोकसभा क्षेत्र के जातीय समीकरण को देखें तो यहां कुल मतदाताओं की संख्या 20.47 लाख से अधिक है। इनमें सबसे अधिक तीन लाख से ज्यादा कुर्मी मतदाता हैं। यादव मतदाताओं की संख्या भी दो लाख से अधिक है। वहीं, पिछड़ी जाति के अन्य मतदाताओं की संख्या तीन लाख से अधिक है।
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वोटर लिस्ट - फोटो : Istock
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चुनाव की तारीख नजदीक आने के साथ ही राजनीतिक दल भी पत्ते खोलने लगे हैं। इसी के साथ जीत-हार के समीकरण भी बनने लगे हैं। फूलपुर में निर्णायक भूमिका निभाने वाले पिछड़ों पर सभी दलों की नजर है। इस सीट पर पिछड़ों में भी चुनाव को कुर्मी बनाम अदर बैकवर्ड बनाने की जोड़तोड़ शुरू हो गई है। वहीं, इलाहाबाद सीट पर बसपा ने अभी उम्मीदवार की घोषणा नहीं की, लेकिन भाजपा और कांग्रेस ने अगड़ी जाति के साथ सियासी परिवारों पर दांव खेला है। इससे लड़ाई करीबी बताई जा रही है।

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फूलपुर लोकसभा क्षेत्र के जातीय समीकरण को देखें तो यहां कुल मतदाताओं की संख्या 20.47 लाख से अधिक है। इनमें सबसे अधिक तीन लाख से ज्यादा कुर्मी मतदाता हैं। यादव मतदाताओं की संख्या भी दो लाख से अधिक है। वहीं, पिछड़ी जाति के अन्य मतदाताओं की संख्या तीन लाख से अधिक है। करीब ढाई लाख मुस्लिम व ढाई लाख से अधिक अनुसूचित जाति के मतदाता भी हैं। अगड़ी जातियों में ब्राह्मण वोटरों की संख्या करीब दो लाख है। शहर की दोनों विधानसभा क्षेत्रों शहर उत्तरी एवं पश्चिमी में कायस्थ मतदाताओं की संख्या भी दो लाख से अधिक है।

11 बार पिछड़ी जाति के लोग दर्ज कर चुके हैं जीत

फूलपुर सीट पर पिछड़ों की निर्णायक भूमिका रहती है। इनमें भी कुर्मी मतदाताओं की बड़ी भूमिका होती है। इसका अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि 1977 में कमला बहुगुणा जीती थीं। इसके बाद 12 चुनाव हुए और 11 बार पिछड़ी जाति के उम्मीदवार विजयी रहे। अगड़ी जाति से कपिल मुनि करवरिया की ही जीत हुई है। इनके अलावा 2004 में अतीक अहमद की जीत हुई थी तो 2014 में केशव प्रसाद मौर्य जीते थे।

गौर करने वाली बात यह है कि शेष नौ चुनावों में भी कुर्मी उम्मीदवार ही संसद पहुंचने में सफल रहे।इस जातीय समीकरण को देखते हुए भाजपा ने प्रवीण पटेल को उम्मीदवार बनाया है। वहीं, सपा ने यादव व मुस्लिम मतदाताओं के साथ अन्य पिछड़ी जातियों के ध्रुवीकरण को ध्यान में रखते हुए अमर नाथ मौर्य को प्रत्याशी बनाया है। सपा के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार पार्टी की पूरी कोशिश चुनाव को कुर्मी बनाम अदर बैकवर्ड बनाने की भी है।

हालांकि, डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के मजबूत दखल वाली इस सीट पर सपा की रणनीति कितनी सफल होगी यह तो चुनाव के नतीजे ही बताएंगे। बसपा की भी एक लाख से अधिक जाटव व मुस्लिम मतदाताओं के साथ अदर बैकवर्ड मतदाताओं पर नजर है। इस समीकरण को ध्यान में रख पार्टी ने जगन्नाथ पाल को उम्मीदवार बनाया है।

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इलाहाबाद सीट पर ब्राह्मण मतदाता हैं निर्णायक 

इलाहाबाद सीट की स्थिति उलट है। इस सीट पर ब्राह्मण तथा भूमिहार मतदाताओं की निर्णायक भूमिका मानी जाती है। वहीं, पिछड़ों में निषाद, कुर्मी मतदाताओं की अधिक संख्या है। इस सीट पर कोल मतदाताओं की भी बड़ी संख्या है। हालांकि, चुनावों में इस सीट पर अगड़ी जाति के नेताओं का ही वर्चस्व रहा है। इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि अब तक सभी चुनावों में अगड़ी जाति के नेता ने ही जीत हासिल की है।

इसी समीकरण को देख भाजपा ने नीरज त्रिपाठी, कांग्रेस ने सपा से आए उज्ज्वल रमण सिंह को उम्मीदवार बनाया है। नीरज भाजपा के कद्दावर नेता रहे पूर्व राज्यपाल केशरी नाथ त्रिपाठी के पुत्र हैं तो उज्जवल के पिता रेवती रमण सिंह यहां से दो बार सांसद रहे। इसके अलावा उनका क्षेत्र के लोगों के बीच चार दशक से मजबूत दखल है।

इस तरह से यह चुनाव दो सियासी परिवारों का होने से भी दिलचस्प हो गया है। ऐसे में सभी की नजर बसपा है। बसपा ने अभी उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है। हालांकि, बसपा की ओर से पिछड़ी जाति से उम्मीदवार बनाए जाने की बात कही जा रही है। यदि ऐसा हुआ तो बहुकोणीय होने के साथ इस चुनाव में भाजपा एवं इंडिया गठबंधन के पिछड़ी जाति के नेताओं की परीक्षा भी होगी।

पल्लवी के आने से बिगड़ेंगे समीकरण

फूलपुर से अपना दल कमेरावादी की राष्ट्रीय अध्यक्ष कृष्णा पटेल के चुनाव लड़ने की संभावना जताई जा रही है। उन्हें एआईएमआईएम का भी समर्थन प्राप्त है। यह गठबंधन पीडीएम (पिछड़ा, दलित एवं मुस्लिम) के हकों की लड़ाई के दावों के साथ लोकसभा चुनाव में ताल ठोक रहा है। ऐसे में पल्लवी फूलपुर से चुनाव लड़ती हैं तो चुनावी समीकरण बदलना तय माना जा रहा है।

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