हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति की किशोरी का अपहरण कर दुष्कर्म करने के आरोपी को सत्र न्यायालय द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। कोर्ट ने सजा का फैसला सुनाते हुए कहा कि एससी-एसटी एक्ट के तहत दुष्कर्म की सजा उम्रकैद है, मगर ट्रायल कोर्ट ने आईपीसी की धारा 376 (2) के तहत और एससी-एसटी एक्ट के तहत अलग-अलग सजाएं सुनाई हैं, जिनकी कोई आवश्यकता नहीं है। दुष्कर्म के आरोपी शाहजहांपुर के झाऊ की आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए यह आदेश न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल और न्यायमूर्ति आरके गौतम की पीठ ने दिया है।
अपीलार्थी झाऊ के खिलाफ पीड़ित किशोरी के पिता ने 156 (3) सीआरपीसी के तहत शिकायत की थी कि आरोपी और एक अन्य उमेश ने उसकी 13 वर्षीय पुत्री को 24 नवंबर 2004 को स्कूल से घर लौटते समय अगवा कर लिया। पुलिस से शिकायत करने पर उसका मुकदमा दर्ज नहीं किया गया, क्योंकि आरोपी ऊंची पहुंच वाले हैं और पीड़ित अनुसूचित जाति का। सीजेएम शाहजहांपुर के आदेश पर पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू की। पीड़ित किशोरी भी बरामद कर ली गई। उमेश के नाबालिग होने के कारण उसकी पत्रावली किशोर न्यायालय भेज दी गई।
सत्र न्यायालय ने झाऊ परअपहरण, दुष्कर्म के इरादे से अपहरण, दुराचार और अनुसूचित जाति की किशोरी से दुराचार की धाराओं में उम्रकैद और जुर्माने की सजा सुनाई। सजा के आदेश के खिलाफ आरोपी की ओर से जेल अपील दाखिल की गई। इस पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने सत्र न्यायालय के निष्कर्ष को सही ठहराया और अपील खारिज कर दी। मगर, कोर्ट ने एक ही अपराध में अलग-अलग सजाएं सुनाने को सही न मानते हुए दुष्कर्म के इरादे से अपहरण और अनुसूचित जाति की किशोरी से दुराचार की धाराओं में सजा बरकरार रखी है।