इज्जत, शोहरत, दौलत और मनचाहा प्यार, सभी कुछ हासिल हो जाए तो खुशी का पारावार नहीं होता लेकिन इससे जीवन को सफल और सुखद तभी बनाया जा सकता है जब इन सभी को संभालने और इनके बीच बेहतर संतुलन का सलीका भी आए। इन सब को हासिल करना आज के युवाओं की चाहत होती है लेकिन किसी मुद्दे पर जरा सी चोट लगते ही उम्मीदें ताश के पत्तों की तरह बिखर जाती हैं।
बालिका वधू फेम प्रत्यूषा बनर्जी को भी चौबीस बरस की उम्र में ही नाम, शोहरत, पैसा, प्यार सब कुछ मिल गया था, मगर एक जरा सी चोट लगते ही उसने जिंदगी से हार मान ली। यह स्थिति आज तकरीबन हर युवा की है, उन्हें कम उम्र में सब कुछ तो चाहिए लेकिन भावनात्मक रूप से उसे संभालने की परिपक्वता उनमें नहीं है। यह परिपक्वता समय और अनुभव के साथ आती है ऐसे में भावनात्मक तौर पर कमजोर युवा जरा सी ठेस पर आहत हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में अभिभावकों की भी जिम्मेदारी बनती है कि वे अपने बच्चों को भावनात्मक रूप से मजबूत बनाएं और विश्वास दिलाएं कि वे जिंदगी के उतार-चढ़ाव में उनके साथ हैं।
मनोवैज्ञानिक मालविका राव कहती हैं, यह ऐसी उम्र होती है जब युवा खूब सारे ड्रीम प्रोजेक्ट बना लेते हैं। उन्हें अच्छा कॅरियर, पैसा, प्यार सभी कुछ चाहिए। अगर उन्हें यह सब मिल भी जाता है तो उन्हें इनके बीच संतुलन बिठाना नहीं आता है। भावनात्मक रूप से जरा सी ठेस में वे खुद को संभाल नहीं पाते हैं। अनकांशियस माइंड में पहले की जितनी भी नकारात्मक यादें होती हैं, वो जेहन में आ जाती हैं। इसी वक्त वह गलत कदम उठाते हैं। इसलिए जरूरी है कि अपने अभिभावकों और उन दोस्तों से परेशानी शेयर करें जो विश्वसनीय हों।
जगत तारन गर्ल्स डिग्री कालेज की प्रॉक्टर डॉ.शिखा दीक्षित कहती हैं, कम उम्र में सफलता, पैसा और प्यार के साथ ही परिपक्वता भी जरूरी है। यह परिपक्वता परिवार, दोस्त और जीवनसाथी तीनों स्तरों के आपसी सामंजस्य से ही आती है। इनमें अस्थिरता होने से ही आज के युवा कल्पना और हकीकत में अंतर नहीं कर पाते हैं। वह हर चीज को कल्पना के साथ जोड़कर देखते हैं, मगर जब चीजें वास्तविकता मेें उससे उलट होती हैं तो वह बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं।
इलाहाबाद संग्रहालय की गाइड लेक्चरर डॉ.संजू मिश्रा कहती हैं, परिपक्वता उम्र के साथ आती है। कम उम्र में भले ही सफलता मिल जाए लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि युवा सभी तरह के फैसले लेने में भी सक्षम हैं। खासतौर पर लड़कियों को तो और भी संभल कर रहने की जरूरत होती है। अभिभावकों की भी यह जिम्मेदारी बनती है कि वह उसे किसी भी स्तर पर कमजोर न बनने दें, ताकि लड़कियां खुद को भावनात्मक रूप से नियंत्रित करना सीख सकें।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सेंटर ऑफ फैशन डिजाइनिंग की प्रोड्क्शन हाउस हेड एकता कहती हैं, जब आप कम उम्र में सफल और सेलिब्रिटी बन जाते हैं तो लोग आपको बतौर यूथआइकन देखते हैं। लोग फालो करने लगते हैं ऐसे में सामाजिक तौर पर जिम्मेदारी बनती है कि समाज को आपसे अच्छा मैसेज मिले। जिंदगी में मुश्किलें तो बहुत आती हैं लेकिन उनका सामना करना आना चाहिए। अभिभावक भी अपने बच्चों से खुलकर बात करें।