भालादेव को देवता के रूप में संग शोभायात्रा की शान रहे। न सिर्फ नागा संन्यासियों बल्कि बैरागी अखाड़ों ने भी अपने जुलूस में ऐसे ही करतब दिखाए। किसी खालसाधारी संत ने चरखी नचाकर इंद्रधनुषी आभा बिखेरी को कोई हाथों में तलवार लेकर अखाड़े में जमकर तलवारबाजी का प्रदर्शन किया। निर्वानी अनी के श्रीमहंत धर्मदास कहते हैं, तरह-तरह के भाले अखाड़ों के देवता हैं तो लंबी-लंबी तलवारों से की गई कलाबाजी अखाड़ों की शान है। जुलूस के दौरान कई जगहों पर लाठियों का भी जमकर प्रदर्शन हुआ, जिसे देखकर लोग दांतों तले ऊंगली दबाते रहे।
डुबकी के बाद भभूत की होली
नागाओं ने डुबकी लगाने के पहले शरीर पर भभूत मले तो डुबकी लगाने के बाद तो बस दिगंबरों के बीच भभूत की होली ही हुई। डुबकी केबाद सभी ने अपने संग लाए पैकेट से भभूत निकालकर परंपरा के मुताबिक शृंगार किया। वहीं दूसरे नागाओं के शरीर पर भी भभूत का लेप किया, जहां भभूत लगाना उनके लिए संभव नहीं था।