केश प्रसाद मौर्या और मनोज सिन्हां
प्रदेश का डिप्टी सीएम घोषित होने वाले केशव प्रसाद मौर्य का जीवन संघर्ष से भरा रहा है। पीएम मोदी की तर्ज पर केशव के पिता की भी एक चाय की दुकान थी। कौशाम्बी के सिराथू कस्बे में केशव प्रसाद मौर्य एक छोटी सी चाय की दुकान में पिता के साथ चाय बेचने में सहयोग करते थे। उन्होंने काफी दिनों तक अखबार बेचने का भी काम किया। अपनी इसी दुकान से उन्होंने राजनीति का ककहरा सीखा।
केशव के पिता श्यामलाल मौर्य की ब्लॉक के सामने चाय की एक छोटी दुकान थी। केशव भी यहां उनका हाथ बंटाया करते थे। केशव के करीबियों की मानें तो वर्ष 1989 में अयोध्या आंदोलन के दौरान विश्व हिंदू परिषद से जुड़े कई बड़े नेता उनकी दुकान पर चाय पीने आया करते थे। यहां अयोध्या आंदोलन से वह विहिप से खासे प्रभावित हुए। इसके बाद वह संगठन से जुड़े। 14 साल की उम्र में ही उन्होंने अपना घर छोड़ दिया और इलाहाबाद आ गए। यहां विहिप का कामकाज संभालने लगे। जल्दी ही वह विहिप दिग्गज अशोक सिंहल के चहेते बन गए। 1989 से 2002 तक वे विहिप में ही रहे। इस दौरान तमाम महत्वपूर्ण पदों पर उन्होंने काम किया।
उनका अधिक समय साधु संतों के बीच बीत रहा था। वर्ष 1996 में रामजन्म भूमि आंदोलन में केशव मौर्य ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अपनी कार्यशैली से छाप छोड़ने वाले केशव ने समय के साथ चलते हुए भाजपा का दामन थामकर सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया। वर्ष 2004 में उन्होंने भाजपा के टिकट पर इलाहाबाद पश्चिमी विधानसभा सीट से किस्मत आजमाई, लेकिन नाकाम रहे। इसके बाद वर्ष 2012 में अपने गृह जनपद सिराथू विधानसभा सीट पर वह पहली बार निर्वाचित हुए। केशव पहली बार विधायक तब बने जब प्रदेश में सपा की आंधी चल रही थी।