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Kinnar Akhara: अजय दास बोले - केवल किन्नरों के लिए होगा अखाड़ा, महाकुंभ के बाद तय होगा नया आचार्य महामंडलेश्वर

Sun, 02 Feb 2025 09:57 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, महाकुंभ नगर (प्रयागराज)

सार

किन्नर अखाड़े में शुरू हुए विवाद को खत्म करने के लिए अखाड़े के संस्थापक रहे ऋषि अजय दास ने नियमों में बदलाव का निर्णय लिया है। उनके अनुसार अब अखाड़े में किन्नरों के अलावा किसी दूसरे को जगह नहीं दी जाएगी।
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ममता कुलकर्णी और ऋषि अजय दास। - फोटो : अमर उजाला।
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किन्नर अखाड़े में शुरू हुए विवाद को खत्म करने के लिए अखाड़े के संस्थापक रहे ऋषि अजय दास ने नियमों में बदलाव का निर्णय लिया है। उनके अनुसार अब अखाड़े में किन्नरों के अलावा किसी दूसरे को जगह नहीं दी जाएगी।

महाकुंभ के बाद किन्नर अखाड़े के नए आचार्य महामंडलेश्वर का चुनाव किया जाएगा। लोकतांत्रिक तरीके से बहुमत के आधार पर किन्नर अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर का पट्टाभिषेक होगा। ऋषि अजय दास ने बताया कि अखाड़े में धर्म विरुद्ध आचरण लगातार हो रहा था। इसलिए कुछ कठोर कदम उठाने पड़ रहे हैं। अब किन्नर अखाड़े के नियमों में बड़े स्तर पर बदलाव किया जाएगा।

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आचार्य महामंडलेश्वर, महामंडलेश्वर या जिम्मेदार पदों को सौंपने से पहले लिखित में अनुबंध कराया जाएगा। अखाड़े के नियमों पर हस्ताक्षर कराया जाएगा। सभी को नियमों का पालन करना होगा। अगर वह सनातन के अनुसार नहीं चलेंगे तो तत्काल हटा दिया जाएगा। समाज की बैठक महाकुंभ के बाद नई दिल्ली में होगी। सभी को आमंत्रित किया जाएगा और बहुमत के आधार पर नए आचार्य महामंडलेश्वर की घोषणा की जाएगी।

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जूना अखाड़े के साथ अनुबंध है अवैधानिक

ऋषि अजय दास ने कहा कि किन्नर अखाड़े का अवैधानिक अनुबंध जूना अखाड़े के साथ करके किन्नर अखाड़े के सभी प्रतीक चिह्नों को क्षत-विक्षत किया गया है। ये लोग न तो जूना अखाड़े के सिद्धांतों के अनुसार चल रहे हैं और न ही किन्नर अखाड़े के। किन्नर अखाड़े के गठन के साथ ही वैजयंती माला गले में धारण कराई गई थी, जो कि शृंगार का प्रतीक है, लेकिन किन्नर अखाड़े में उसे त्याग करके रुद्राक्ष की माला धारण कर ली।

यह संन्यास का प्रतीक है और संन्यास बिना मुंडन संस्कार के मान्य नहीं होता है। अजय दास ने कहा कि 2015-16 उज्जैन कुंभ में लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी को आचार्य महामंडलेश्वर नियुक्त किया गया था। उन्होंने ममता कुलकर्णी को बिना किसी धार्मिक व अखाड़े की परंपरा को मानते हुए वैराग्य के बजाय सीधे महामंडलेश्वर की उपाधि देकर पट्टाभिषेक कर दिया।

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