कौशांबी के कुरई गांव में मंगलवार सुबह पढ़ाई को लेकर बहन से झगड़ने के बाद किशोर ने मां की साड़ी से फंदा लगाकर जान दे दी। भाई की मौत की खबर सुनकर बहन ने चाकू से अपना गला काट लिया।
उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले के संदीपनघाट कोतवाली के कुरई गांव में बहन की फटकार और उससे झगड़ने के बाद छात्र नितिन स्कूल के लिए नहीं, खुदकुशी के इरादे से निकला था। फंदा लगाने के लिए बैग में चुपके से मां की साड़ी रखी और स्कूल पहुंचने से पहले ही जान दे दी।
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विष्णु भगवान पब्लिक स्कूल की प्रिंसिपल प्रीति मिश्रा ने कहा कि घटना बेहद दुखद है। नितिन औसत दर्जे का विद्यार्थी था। लेकिन स्कूल रोज आता था। मंगलवार को नहीं आया था।
चाचा देशराज के अनुसार, नितिन उग्र स्वभाव का था। मंगलवार सुबह उसने फीस के लिए 10 हजार रुपये घर से लिए थे। इस पर बड़ी बहन विनीता ने पढ़ने के लिए नितिन पर जोर दिया था। कहा कि स्कूल से आने के बाद घर पर नहीं पढ़ते हो।
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दिन भर इधर-उधर घूमते रहते हो। इसी को लेकर वह अपनी बड़ी बहन से उलझा तो विनीता ने उसे फटकार लगा दी। बहन की फटकार पर वह तमतमा गया और चुपचाप स्कूल जाने के लिए साइकिल लेकर घर से निकल गया था।
मां ने भी सोचा कि बड़ी बहन पढ़ाई के लिए डांट रही है। वह कुछ नहीं बोली। लेकिन मौत की खबर पर सभी आवाक रह गए। फिर घर में कोहराम मच गया।
एक बेटे को दो साल पहले खो चुका है परिवार
कुरई निवासी रामदेव की चार संतानें थीं। सबसे बड़ी विनीता और दूसरे नंबर का वीरेंद्र था। दो साल पहले गंभीर बीमारी के चलते वीरेंद्र की मौत हो गई थी। तीसरे नंबर पर नितिन था और सबसे छोटी बेटी बिट्टी है।
छोटी बहन भी छत से कूदी
बड़े की मौत पर नितिन की छोटी बहन बिट्टी भी अपना सुधबुध खो बैठी। अचानक वह छत से कूद गई। गनीमत रही कि उसे मामूली चोट ही आई। घटना से परिवारीजन बिलख पड़े। चीख-पुकार सुन जुटे ग्रामीणों की आखों से भी आंसू निकल पड़े।
संवाद व सोशल सपोर्ट की कमी से उठाते हैं आत्मघाती कदम
मोती लाल नेहरू मंडलीय चिकित्सालय के मनोचिकित्सक डॉ. राकेश पासवान कौशाम्बी में हुई घटना के पीछे कई कारण मानते हैं। उनका मानना है कि अभिभावकों से संवाद व सोशल सपोर्ट की कमी के कारण बच्चे आत्मघाती कदम तक उठा लेते हैं।
पहले मोबाइल नहीं थे और परिवार के सभी सदस्य एक-दूसरे को समय देते थे। अगर कोई एक सदस्य कुछ कह देता था तो दूसरे सदस्य से मन की बात करने से गुस्सा शांत हो जाता था।
अब बच्चों का ज्यादा समय सोशल मीडिया पर बीतता है। मना करने में आवेश में आ जाते हैं। अभिभावकों के पास भी बच्चों के लिए समय नहीं है। ऐसे में क्या सही और क्या गलत है, यह बताने वाला कोई नहीं। यही वजह है कि इस तरह के मामले बढ़ रहे हैं।