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कुंभ की तुलना में दो गुना अधिक पानी छोड़ने से माघ मेला में कटान

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Katan at Magh Mela due to two times more water release than Kumbh
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प्रयागराज। कानपुर बैराज से औसत से अधिक पानी लगातार छोड़े जाने की वजह से माघ मेला बसाने में दिक्कतें पैदा होने लगी हैं। शुक्रवार को 15000 क्यूसेक पानी छोड़ा गया। यह जलराशि कुंभ मेले के दौरान संगम पर अविरलता-निर्मलता बनाए रखने के लिए छोड़े जाने वाले जल से दोगुना अधिक है। ऐसे में माघ मेला क्षेत्र के बड़े हिस्से में कटान तेज हो गई है। कटान बढ़ने से माघ मेला के सभी पांच सेक्टरों को जोड़ने के लिए गंगा पर बनाए गए पांच पांटून पुलों को खतरा पैदा होने की आशंका पैदा हो गई है। पीडब्ल्यूडी के मेला डिवीजन के अभियंताओं ने सिंचाई विभाग से पानी पर नियंत्रण के लिए पत्र भी लिखा, लेकिन स्थिति जस की तस रह गई। कहा जा रहा है कि यही हाल रहा तो मेला आरंभ होने तक दलदल जमीनों को समतल करना मुश्किल हो जाएगा।
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त्रिवेणी पांटून पुल के सामने दारागंज की ओर तेज कटान हो रही है। इससे शुक्रवार को भी रेत का बड़ा हिस्सा जलमग्न हो गया। यही हाल रहा तो त्रिवेणी पुल के पास बने पीडब्ल्यूडी के कैंप कार्यालय को शिफ्ट करना पड़ सकता है।
पिछले तीन दिन के भीतर त्रिवेणी पुल में 10 पीपे लगाए जा चुके हैं। नए पीपों के नीचे भी कटान के चलते दलदल बनता दा रहा है। उधर, काली पांटूनपुल कहीं धंस गया है तो कहीं टेढ़ा हो गया है। दलदल केचलते चकर्ड प्लेट मार्गों का काम हर सेक्टर में अधूरा पड़ा है। वाले रास्तों पर रेत और मिट्टी डालकर रास्तों को समतल कराने की कोशिश की जा रही है, ताकि वहां चकर्ड प्लेटें बिछाई जा सकें। मेला डिवीजन के अभियंताओं का कहना है कि पिछले डेढ़ दशक में इस बार दलदल केचलते सबसे अधिक मुश्किलें पैदा हुई हैं। मेला क्षेत्र को यातायात से जोड़ने के लिए मोरी मार्ग से लेकर अरैल के बीच में 16 सड़कें बनाई जानी है, लेकिन अभी आधा से अधिक काम बाकी है। ऐसे में मेला सेक्टरों को जोड़ने के लिए 73 किमी चकर्ड प्लेट सड़कों का भी निर्माण पिछड़ता गया है।
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नहरों में पानी की मांग नहीं रह गई है। ऐसे में कानपुर बैराज से 15 से 17 हजार क्यूसेक तक पानी प्रतिदिन छोड़ा जा रहा है। माघ मेले को देखते हुए प्रवाह को कम करने के लिए पत्र लगातार भेजा जा रहा है, लेकिन पानी गंगा में छोड़ने के अलावा कोई विकल्प फिलहाल नहीं रह गया है। ब्रजेश सिंह, अधिशासी अभियंता-सिंचाई बाढ़ खंड प्रयागराज।
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