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हंडिया के जमींदार सर्वबदन भी जंगे आजादी में चढ़े थे फांसी

Fri, 28 Oct 2016 02:09 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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इलाहाबाद - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो इलाहाबाद
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जंगे आजादी में अपनी जान न्यौछावर करने वाले महान क्रांतिकारी मंगल पांडे, शहीद भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद के नाम तो सभी जानते हैं, पर देश के लिए शहीद होने वाले तमाम क्रांतिकारी ऐसे भी हैं जिनकी शहादत गुमनाम ही रह गई। इनको न तो इतिहास के पन्नों में जगह मिल पाई और न इनकी वीरता के किस्से कहे-सुने गए। आजादी के ऐसे ही दीवानों में हंडिया तहसील के जमींदार सर्वबदन सिंह और उनके 11 साथियों के नाम भी शामिल हैं, जिन्होंने देश के लिए हंसते-हंसते अपनी जान दे दी थी। मगर उनकी शहादत सरकारी फाइलों में ही दफन होकर रह गई।
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जिला प्रशासन ने बृहस्पतिवार को कुछ ऐसे ही दस्तावेजों को सार्वजनिक किया तो मानों इतिहास फिर से जाग उठा। डीएम द्वारा जारी दस्तावेजों में हंडिया के मरदानपुर गांव के जमींदार सर्वबदन सिंह की फाइल भी शामिल है। फारसी, उर्दू, अंग्रेजी, हिंदी भाषा में लिखी कुल 475 मुकदमों की 510 पत्रावलियां शामिल हैं। पांच फाइलें 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी हुई हैं, जिसके चार मामले सर्वदन सिंह और उनके साथियों से जुड़े हुए हैं।


1857 की गदर में सर्वबदन सिंह ने विद्रोह का झंडा बुलंद किया तो अंग्रेजों ने भी बदला लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सर्वबदन की जमींदारी छीनकर दूसरों को बांट दी गई। उन पर डकैती और लूट के चार मुकदमे दर्ज करा दिए गए।
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परगना खैरागढ़, मरदानपुर गांव के रहने वाले जमींदार सर्वबदन सिंह पर 1857 के आंदोलन में जब अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोलने पर तत्कालीन जमींदारों की ओर से ही मुकदमे दर्ज कराए गए। इनमें से श्रीदत्त उर्फ दत्तीलाल बनाव सर्वबदन सिंह, दौलत सिंह  व अन्य पांच, मोहन लाल सिंह बनाम सर्वबदन सिंह, दौलत सिंह, बंधु सिंह, गिरधारी सिंह, देवश्री मिश्रा, भवानी प्रसाद समेत 12, जमींदार बंशीधर के कारिंदा दीन दयाल बनाम सर्वबदन सिंह, बहादुर सिंह आदि मामले शामिल हैं। इन सभी मुकदमों में उनके  ऊपर डकैती, लूटपाट, बलवा, षड़यंत्र में शामिल होने समेत कई आरोप लगाए गए थे।


अभिलेखागार के पर्सियन भाषा के जानकर गुलाम सरवर ने बताया कि दस्तावेजों के मुताबिक मोहन लाल सिंह के मामले में सर्वबदन सिंह और उनके साथियों को पहले आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी, जिसे बाद में महारानी विक्टोरिया के आदेश से डिप्टी अख्तियारी मजिस्ट्रेट सैयद नासिर अली खां बहादुर की कोर्ट ने फांसी की सजा में तब्दील कर दिया गया। इतना ही नहीं ब्रिटिश शासकों ने ऐसे विद्रोहियों के खिलाफ अभियोग चलाने से पहले उनका पूरा विवरण भी एकत्र किया था। उसका एक प्रारूप भी कोर्ट को भेजा था। पूरा विवरण मिलने के बाद इन सभी को फांसी की सजा सुनाई गई।
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इलाहाबाद। पहले स्वतंत्रता संग्राम में शहीद होने वाले जमींदार सर्वबदन सिंह और उनके साथियों की शहादत को इंसाफ मिलने में डेढ़ शताब्दी (168) से अधिक समय लग गया। दस्तावेजों के सार्वजनिक होने के बाद देश अब इन शहीदों को अपराधी नहीं शहीदों के तौर पर जानेगा। डीएम  संजय कुमार ने कहा कि इन फाइलों को सार्वजनिक करने से अब उनके परिवार के लोग और देश की जनता भी जान सकेगी कि जिनके ऊपर मुकदमे चलाए गए थे वे असल में अपराधी नहीं बल्कि वे आजादी के दिवाने थे। जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपनी जान न्यौछावर कर दी थी। उन्हें लोग सम्मान की नजरों से देखेंगे। इन दस्तावेजों में आजादी के लिए आम लोगों के योगदान उजागर किए गए हैं। इससे छात्रों, शिक्षकों को फायदा मिलेगा। क्षेत्रीय अभिलेखाधिकारी अमित कुमार अग्निहोत्री ने कहा कि इनका डिजिटलाइजेशन कर संरक्षित कर दिया जाएगा। इस मौके पर सूचनाधिकारी मनोज कुमार, पुनीत शुक्ला, डॉ. ओपीएल श्रीवास्तव आदि मौजूद रहे।

डीएम ने संगम सभागार में जिले के 37 थानों की 1857 से लेकर 1957 तक की पत्रावलियों को उजागर किया है। इसमें 100 साल तक के ऐसे दस्तावेज शामिल हैं जिनमें देश का इतिहास दर्ज है। ज्यादातर फाइलें 1930 के बाद की हैं। सबसे अधिक कोतवाली थाने के 52 मामले, कीडगंज, मुट्ठीगंज एवं सरायममरेज के 1930-31 के 29 मामले, पश्चिम शरीरा के 25 मामले, हंडिया के 24 मामले, दारागंज के  44 मामले शामिल है। इसके अलावा 35 मामले 1954 में कुंभ मेला के भी उजागर किए गए हैं। कलेक्ट्रेट के रिकार्डों का खंगालने के लिए अभिलेखागार की ओर से दो सदस्यीय टीम ने एक साल तक काम किया।


1954 में कुंभ की भगदड़ का भी हुआ खुलासा
ऐतिहासिक दस्तावेजों में 1954 के कुंभ में तीन फरवरी को मौनी अमावस्या के दिन परेड मैदान में हुई भगदड़ से जुड़ी पत्रावलियां भी शामिल हैं। इसमें उन लोगों के नाम उजागर किए गए हैं जो भगदड़ में मारे गए या फिर गंभीर रूप से घायल होकर अस्पताल पहुंच गए। कुछ ऐसे भी नाम शामिल हैं जिनकी शिनाख्त नहीं हो पाई।  

1931 के किसानों के लगान बंदी के आंदोलन के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के खिलाफ मुकदमा चलाया गया था। प्रधानमंत्री शास्त्री ने सराय ममरेज में सभा की और किसानों के आंदोलन का समर्थन किया। उनके ऊपर 17 क्रिमिनल ला अमेंडमेंट एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर कार्यवाही शुरू कर दी। जारी किए गए दस्तावेजों में उनके केस के ट्रायल की पत्रावलियां भी शामिल हैं। इसके अलावा समाचार पत्रों के संकलन भी 1930 से लेकर 1945 तक सार्वजनिक किए गए हैं, जिसमें घटनाओं का जिक्र किया गया है। 1931 में भगत सिंह की फांसी के दौरान इलाहाबाद, प्रतापगढ़ समेत आसपास के जिलों में हुुई घटनाओं की भी रिपोर्ट सामने आई हैं।
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