सफलता मिली तो छात्रों ने बड़ा चूल्हा बना दिया और हीरालाल ने भट्ठी की जगह इसका इस्तेमाल शुरू कर दिया। एक डिब्बे में डीजल भरा और उसे एक पाइप से जोड़कर हवा पंप करने वाली मोटर से जोड़ दिया और इसके बाद पाइप को चूल्हे पर लगा दिया।हवा पंप करने वाली मोटर उन्होंने कबाड़ मार्केट से खरीदी, जिसका उपयोग वाहनों में किया जाता है। कुल 2200 रुपये में चूल्हा बनकर तैयार हो गया। हीरालाल ने बताया कि रसोई गैस पर जितना पैसा खर्च होता था, जुगाड़ से जलने वाले चूल्हे पर उसका आधा खर्च हो रहा है। उन्होंने कहा कि अब रसोई गैस की जरूरत ही नहीं है। आगे भी इसी चूल्हे का इस्तेमाल करते रहेंगे।