जवाहर पंडित हत्याकांड का मुकदमा जिन कई विरोधाभासों से गुजरा, उसमें सबसे अहम था अभियोजन द्वारा वाद वापसी की मांग। जिस अभियोजन ने पहले यह कहते हुए मुकदमा वापस लेने की मांग की थी कि इस केस में ऐसे साक्ष्य नहीं है कि अभियुक्तों को सजा दिलाई जा सके।
बाद में अभियोजन के उन्हीं साक्ष्यों का विचारण करते हुए अदालत ने न सिर्फ अभियुक्तों को उम्रकैद की सजा सुनाई, बल्कि इस विरोधाभास का भी समाधान कर दिया।
उल्लेखनीय है कि कोर्ट ने जवाहर हत्याकांड में पूर्व बसपा सांसद कपिलमुनि करवरिया, पूर्व भाजपा विधायक उदयभान करवरिया और पूर्व बसपा एमएलसी सूरजभान करवरिया और उनके रिश्तेदार रामचंद्र त्रिपाठी को उम्रकैद की सजा सुनाई है।
जज बद्रीविशाल पांडेय ने अपने फैसले में लिखा है कि इस मामले में मृतक और अभियुक्त दोनों ही राजनीतिक पृष्ठभूमि के हैं। अभियुक्तों में एक पूर्व सांसद, एक पूर्व विधायक और एक पूर्व एमएलसी हैं। पूर्व विधायक उदयभान करवरिया की पत्नी नीलम करवरिया भाजपा से विधायक हैं।
उन्हीं के प्रार्थनापत्र पर वाद वापसी की कार्यवाही प्रारंभ हुई थी। ऐसे में उक्त कार्यवाही में राजनीतिक प्रभाव के प्रयोग से इंकार नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि वाद वापसी का प्रार्थनापत्र जिस आधार पर दिया गया तथा अब अभियोजन की ओर से अपना केस संदेह से परे साबित करना कहा जा रहा है, उसका प्रभाव इस विचारण पर नहीं पड़ेगा, क्योंकि अब मुकदमे का विचारण पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्यों के गुणदोष के आधार पर किया जा रहा है।
कोर्ट ने कहा कि वाद वापसी में राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल स्पष्ट दिखाई दे रहा है, इसलिए वाद वापसी के संबंध में की गई कार्यवाही इस मुकदमे के निस्तारण में महत्वहीन है। इसी प्रकार से कोर्ट ने बचाव पक्ष की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि प्राथमिकी दर्ज कराने के मामले में राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल किया गया।
क्योंकि घटना के समय 13 अगस्त 1996 को प्रदेश में राष्ट्रपति शासन था और समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव केंद्र में रक्षामंत्री थे। जवाहर यादव की हत्या के बाद वह उसके परिवार से मिलने 14 अगस्त को सेना के हेलीकाप्टर से आए थे। जवाहर के मुलायम सिंह यादव से अच्छे संबंध थे।
बताते चलें कि अभियोजन ने पहले जवाहर हत्याकांड का मुकदमा करवरिया बंधुओं से उठाने के लिए कोर्ट में अर्जी दी थी, जिसे कोर्ट ने 10 दिसंबर 2018 को खारिज कर दिया था। इसके खिलाफ निगरानी हाईकोर्ट ने 19 जुलाई 2019 को खारिज कर दी।
ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक था कि जो अभियोजन यह दावा कर रहा है कि इस केस में अभियुक्तों को सजा दिलाने योग्य साक्ष्य नहीं है, उसी अभियोजन ने उन्हीं साक्ष्यों को संदेह से परे साबित होना कैसे कहा। अदालत ने इसका समाधान अपने फैसले में कर दिया है।