सुबह के चार बजे भैरव के स्वरों के साथ शुरू होती साधना केवल संगीत नहीं, बल्कि आत्मा और अध्यात्म का संवाद है, यही ध्रुपद है। भारतीय शास्त्रीय संगीत की वह प्राचीन धारा, जिसे दरभंगा घराना बीते पांच सौ वर्षों से संजोए हुए है।
दरभंगा घराने की 12वीं पीढ़ी का प्रतिनिधित्व इविवि के संगीत व प्रदर्शन कला के विभागाध्यक्ष ध्रुपद गायक पंडित प्रेम कुमार मल्लिक कर रहे हैं। जब वह अपनी परंपरा की बात करते हैं, तो वह ऐसे विरासत की के बारे में बताते हैं जो तानसेन की सेनिया परंपरा से निकलकर नई पीढ़ी तक पहुंच रही है।
दो भाइयों ने दी दरभंगा घराने की संगीत की दिशा
दरभंगा घराने की वंश परंपरा के अनुसार इसके आधार स्तंभ पंडित राधाकृष्ण मल्लिक और पंडित कर्ताराम मल्लिक थे। दोनों भाइयों ने सेनिया परंपरा में तानसेन के वंशजों से जुड़े उस्ताद भूपत खां महारंग से 22 वर्षों तक संगीत की शिक्षा प्राप्त की। 16वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में दरभंगा क्षेत्र में भीषण अकाल पड़ा। दोनों भाइयों नें मेघ मल्हार का गायन किया और वर्षा हो गई। इस पर दरभंगा महाराजा ने उन्हें जागीर प्रदान कर अपने राज्य में बसने का आग्रह किया। यहीं से दरभंगा घराने की नींव मजबूत हुई और यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती गई।
ध्रुपद : केवल संगीत नहीं, आध्यात्मिक साधना
पंडित प्रेम कुमार मल्लिक बताते हैं कि ध्रुपद भारतीय शास्त्रीय संगीत की सबसे प्राचीन और शुद्ध गायन शैली है। इसकी जड़ें सामवेद और वैदिक परंपरा से जुड़ी हुई हैं। इसके संस्थापक तानसेन और उनके गुरु स्वामी हरिदास थे।
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छह रागों की 36 रागनियां
घराने की परंपरा में छह प्रमुख रागों भैरव, मालकौंस, हिंडोल, दीपक, श्री और मेघ को विशेष महत्व प्राप्त है। इन छह रागों की 36 रागनियां हैं। इन्हें तानसेन काल की मूल राग परंपरा माना जाता है।
विदेशों में भी गूंज रहे हैं ध्रुपद के स्वर
पंडित मल्लिक बताते हैं कि लंदन के प्रतिष्ठित दरबार फेस्टिवल में उन्हें तीन बार आमंत्रित किया गया। जर्मनी के भारत महोत्सव और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी पर भी उन्हें आमंत्रित किया गया। विदेशों में लोग भारतीय संगीत की जड़ों को समझना चाहते हैं।
भविष्य को लेकर आश्वस्त
पंडित प्रेम कुमार मल्लिक का मानना है कि ध्रुपद की यह अमूल्य विरासत आगे भी जीवित रहेगी। भारतीय संगीत की पहचान बनती रहेगी। परंपराएं केवल खून के रिश्तों से नहीं, शिष्यों की निष्ठा से भी जीवित रहती हैं। जब तक साधना और समर्पण रहेगा ,दरभंगा घराने के सुर गूंजते रहेंगे।
प्रो. पं. प्रेम कुमार मल्लिक परिचय व प्रमुख उपलब्धियां
प्रो. पं. प्रेम कुमार मल्लिक दरभंगा घराने की ध्रुपद परंपरा के बारहवीं पीढ़ी के प्रतिष्ठित गायक हैं। उन्होंने अपने पिता पं. विदुर मलिक और दादा पं. सुखदेव मलिक से संगीत की शिक्षा प्राप्त की। वर्ष 1980 में ऑल इंडिया रेडियो राष्ट्रीय संगीत प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त कर राष्ट्रपति नें स्वर्ण पदक से सम्मानित किया। वे ध्रुपद के साथ खयाल, ठुमरी, दादरा, टप्पा और भजन गायन में भी दक्ष हैं। वर्तमान में वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के संगीत व प्रदर्शन कला विभाग में प्रोफेसर व विभागाध्यक्ष हैं। उन्हें 2019 का संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 2015 में बिहार कला पुरस्कार सहित अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से नवाजा जा चुका है।