इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और अधीनस्थ न्यायालयों की ओर से सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लेख करते हुए जजों के नाम लिखने को गैरजरूरी बताया। न्यायमूर्ति समित गोपाल की एकल पीठ ने कहा कि पूर्व में भी इस पर चेतावनी दी जा चुकी है। ऐसे मामलों में केवल साइटेशन, केस नंबर, पक्षकारों के नाम, निर्णय की तिथि और जिस अंश पर निर्भर किया जा रहा है, वही लिखा जाए।
मेरठ निवासी याची प्रियंक कुमार ने अपने रिश्तेदारों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू करने की मांग की थी। आरोप लगाया था कि रिश्तेदारों ने उसके भाई को मेडिकल कॉलेज में क्लर्क की नौकरी दिलाने के नाम पर रुपये लिए थे। याची के अनुसार उसने एक डॉक्टर के बैंक खाते में 50 हजार रुपये ट्रांसफर किए। बाद में चार लाख रुपये नकद भी दिए। नौकरी न मिलने और रकम वापस न होने पर उसने सीआरपीसी की धारा-156(3) के तहत जिला अदालत में आवेदन दिया था।
अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट और अपर सत्र न्यायाधीश मेरठ ने उसकी शिकायत खारिज कर दी। याची ने इसी आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि मेरठ के अपर सत्र न्यायाधीश (पुनरीक्षण न्यायालय) ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का उल्लेख करते हुए उस पीठ में शामिल जजों के नाम भी लिख दिए थे। इस पर कोर्ट ने नाराजगी जताई।