हाईकोर्ट ने शिक्षिका के कृत्य को माना गैरजिम्मेदाराना
राज्य सरकार के स्थायी अधिवक्ता ने तर्क दिया कि याची 2004 से 2009 के बीच 1,220 दिन बिना अवकाश स्वीकृत कराए अनुपस्थित रही। उसे जवाब देने के कई अवसर दिए गए। समाचार पत्र में नोटिस प्रकाशित किया गया। लेकिन, याची विभाग में न पेश हुई और न ही अनुपस्थिति का कोई स्पष्टीकरण दिया।
कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए सेवा समाप्ति के आदेश को रद्द करने से इन्कार कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पूर्वाग्रह के परीक्षण के सिद्धांत का जिक्र किया। कहा कि यदि जांच में प्रक्रियात्मक चूक हुई हो तो भी याची को ही अपने साथ हुए अन्याय को साबित करना होता है। उसे ही साबित करना होगा कि पूर्वाग्रह के चलते उसे निष्पक्ष सुनवाई का अवसर नहीं मिला।
मौजूदा मामले में याची ने आरोपों का खंडन न किया और न ही गैरहाजिरी का संतोषजनक कारण बताया। इससे यह साबित होता है कि याची जानबूझकर अवकाश स्वीकृत कराए बिना करीब पांच साल तक विद्यालय से गायब रही। यह एक गैरजिम्मेदाराना हरकत है। लिहाजा, याची को शिक्षक के पद पर बने रहने का कोई हक नहीं है।