प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि हड्डी टूटने, गंभीर चोट के आरोप के बावजूद यदि सत्र न्यायालय जानलेवा हमला, गालीगलौज का आरोप निर्मित करता है तो इसमें कोई अवैधानिकता या दोष नहीं है। मुकदमे के विचारण के समय साक्ष्य आने पर आरोप बनाया जा सकता है। कोर्ट ने सभी आरोपित धाराओं में न्यायालय द्वारा आरोप निर्मित न करने की वैधता को लेकर दाखिल पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी है। यह आदेश न्यायमूर्ति राजवीर सिंह ने सिप्री बाजार झांसी के दीपक पाल की याचिका पर दिया है।
याची ने धारदार हथियार से हमला व मारपीट के आरोप में प्राथमिकी दर्ज कराई। पुलिस की चार्जशीट पर सत्र न्यायालय ने गंभीर चोट व फ्रैक्चर की धाराओं में आरोप निर्मित नहीं किए, केवल जानलेवा हमला करने व अन्य आरोप निर्मित किया। याची शिकायतकर्ता का कहना था कि सभी धाराओं में आरोप निर्मित किया जाए, क्योंकि गंभीर चोट के साथ फ्रैक्चर है।
विपक्षी अधिवक्ता का कहना था कि कोर्ट कभी भी साक्ष्य पेश होने पर आरोप निर्मित कर सकती है। व्यर्थ ही चुनौती दी गई है। जानलेवा हमला का आरोप अन्य आरोपों से गंभीर है। सजा अधिक हो सकती है। कोर्ट ने आरोप निर्मित करने के आदेश में कोई अवैधानिकता नही होने के कारण हस्तक्षेप से इंकार कर दिया है।