इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी ऐसे व्यक्ति का पासपोर्ट जब्त करना अनिवार्य नहीं है, जिसके खिलाफ वैवाहिक विवाद से जुड़ा आपराधिक मामला लंबित हो। कुछ परिस्थितियों में पासपोर्ट अधिकारी कारण दर्ज करके उसे जब्त कर सकता है। लेकिन, यह जरूरी नहीं है कि हर मामले में अधिकारी को पासपोर्ट जब्त करे। न्यायमूर्ति शेखर बी.सराफ और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की पीठ ने मोहम्मद उमर की याचिका पर सुनवाई करते हुए पासपोर्ट जब्त करने के आदेश को रद्द कर दिया है।
याची मोहम्मद उमर सऊदी अरब में नौकरी कर रहा था। उसकी पत्नी फातिमा जहरा ने उसके खिलाफ दहेज उत्पीड़न सहित विभिन्न मामलों में अम्बेडकर नगर के महिला थाने में मुकदमा दर्ज करा दिया। क्षेत्रीय अधिकारी ने लंबित आपराधिक मामले के आधार पर पासपोर्ट जब्त करने का आदेश जारी कर दिया। इस आदेश को याची ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
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याची के वकील ने दलील दी कि यदि पासपोर्ट धारक के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही लंबित है तो पासपोर्ट अधिकारी जब्त कर सकता है। लेकिन, इसका मतलब यह नहीं है कि पासपोर्ट अधिकारी को प्रत्येक मामले में पासपोर्ट जब्त करना आवश्यक है। याची के पासपोर्ट को जब्त करना अनुचित है, उक्त निर्णय को कानून की नजर में बरकरार नहीं रखा जा सकता है।
कोर्ट ने कहा कि याची के खिलाफ वैवाहिक कलह से संबंधित एक आपराधिक मामला लंबित है। इस मामले की कार्यवाही पर उच्च न्यायालय ने रोक लगा दी है। पक्षों के बीच सुलह की कार्यवाही प्रक्रिया में है। कोर्ट ने कहा कि पासपोर्ट को जब्त करने का निर्णय लेते समय तथ्यों पर विचार नहीं किया गया। कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए 30 मई 2023 के पासपोर्ट जब्त करने के आदेश को रद्द कर दिया। साथ ही छह सप्ताह की अवधि के भीतर एक नया आदेश पारित करने का निर्देश दिया।