जानीमानी कथा लेखिका ममता कालिया ने कथा लेखिका कृष्णा सोबती को ज्ञानपीठ पुरस्कार दिए जाने की घोषणा पर खुशी जाहिर की। हालांकि कृष्णा जी को काफी देर में यह पुरस्कार दिए जाने के बहाने उन्होंने पुरस्कारों की घोषणा और बौद्धिक लेखन को लेकर तमाम तीखे सवाल भी किए।
‘अमर उजाला’ से बातचीत में उन्होंने शिद्दत से स़ृजन के संघर्ष और सरोकारों को रेखांकित किया। बोलीं, पहली बात तो यह कि ज्ञानपीठ भारत का एकमात्र ऐसा पुरस्कार है, जो हमेशा देर में मिलता है। जिसको भी मिला, देर से मिला। श्रीलाल शुक्ल जी को अस्पताल में जाकर दिया गया तो अमरकांत जी को भी बहुत देर में मिला। पहले एक लतीफा चलता था कि जिसकी मौत आई हो, उसे ज्ञानपीठ दे दो। आज ऐसा नहीं कि कृष्णा जी ने कोई महान चीज लिख दी। शुक्रवार को ही वह भी अस्पताल पहुंच गईं। आनन-फानन में पुरस्कारों की घोषणा हुई। ‘आई होप’ कि वह सही सलामत घर लौटें। बहुत खुशी की बात है कि यह पुरस्कार एक महिला साहित्यकार को मिला है लेकिन यह पुरस्कार उन्हें तभी मिल जाना चाहिए था जब उन्होंने ऐ लड़की जैसी रचना लिखी थी।
खाली ज्ञानपीठ की ही बात नहीं है, मैं इसके विरोध में नहीं हूं लेकिन किसी भी लेखक का सम्मान आते-आते इतनी देर हो जाती है कि उसकी आंखें थक जाएं और लेखनी क्षीण हो जाए। फिर चाहे वह सम्मान छोटा हो या बड़ा। मराठी, उड़िया सहित अन्य भाषाओं में बहुत सारे सम्मान है। हिन्दी में बहुत बड़ा तबका लेखन से जुड़ा है जबकि हिन्दी में पुरस्कारों की संख्या सबसे कम है। यह विसंगति है, इसे हिन्दी समाज को दूर करना चाहिए।
आज साहित्य को सशक्त करने की बात की जा रही है लेकिन कई पुरस्कार तो ऐसे भी हैं, जिसमें सिर्फ शाल और श्रीफल के सिवा कुछ भी नहीं दिया जाता है। किसी मजदूर से तसला उठवाकर देखिए, वहीं किसी लेखक से तीन-चार घंटे बुलवाते हैं, इसके लिए वह कई-कई दिनों की तैयारी करता है लेकिन साहित्यकार को कूड़े में डाल दिया जाता है, उसे कुछ भी नहीं दिया जाता है। प्रकाशक लेखकों की रायल्टी और संस्थाएं पुरस्कार नहीं देती हैं। बौद्धिक श्रम नि:शुल्क हो गया है। अगर अखबार न हों तो कोई लेखक का नाम भी न जान पाए। जो काम संस्थाओं को करना चाहिए था, वह अखबार कर रहे हैं।