इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आयकर विभाग के अधिकारियों पर गंभीर टिप्पणी करते हुए केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) को उनकी जवाबदेही तय करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि एक प्रभावी प्रणाली के अभाव के कारण आयकर अधिकारियों द्वारा लगातार प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन किया जा रहा है। इसके लिए सीबीडीटी को ठोस कदम उठाने की जरूरत है। यह आदेश न्यायमूर्ति सूर्य प्रकाश केसरवानी और न्यायमूर्ति जयंत बनर्जी की खंडपीठ ने नैबको प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम भारत संघ व अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।
कोर्ट ने मामले में राजस्व अधिकारियों पर 50,000 का हर्जाना भी लगाया कहा कि हर्जाने की रकम दो सप्ताह के भीतर निर्धारित को लागत का भुगतान करने के लिए दी जाए। कोर्ट ने कहा कि आयकर अधिनियम की धारा 148 में यह प्रावधान है कि निर्धारण अधिकारी को जांच करने और धारा 148 के तहत नोटिस जारी करने से पहले निर्धारिती (जिस पर कर निर्धारित किया गया) को सुनवाई का अवसर प्रदान किया जाए।
धारा 148 में निर्धारण अधिकारी द्वारा नोटिस जारी करने का प्रावधान है। याची की ओर से कहा गया कि उसने 22 मार्च 2022 को जारी नोटिस का जवाब प्रस्तुत किया था। हालांकि निर्धारिती ने कहा कि राजस्व विभाग ने 148 (डी) के तहत 30 मार्च 2022 के तहत एक आदेश पारित किया। इस आदेश में यह कहा गया कि निर्धारिती द्वारा कोई जवाब प्रस्तुत नहीं किया गया था। बाद में याची ने इस संबंध में गलती सुधार के लिए एक आवेदन दायर किया, जिसे आयकर विभाग ने खारिज कर दिया।
कोर्ट ने इसे नैसर्गिक न्याय के विरुद्ध बताया। कहा कि यह न्याय के सिद्धांतों का खुला उल्लंघन है। कोर्ट ने इस मामले में सीबीडीटी को ठोस कदम उठाए जाने की जरूरत बताई और आयकर विभाग की ओर से याची को जारी नोटिस को रद्द कर दिया। कहा कि विभाग इस मामले में याची का पक्ष फिर से सुनकर आदेश पारित करे। इसके साथ ही सीबीडीटी को कंप्यूटरीकृत प्रणाली में कमियों को दूर करने और दोषी अधिकारियों व कर्मचारियों के लिए जवाबदेही की प्रणाली विकसित करने का निर्देश दिया।