धीरे-धीरे होली का त्योहार समीप आ रहा है। ऐसे में गांवों में पखवाड़े भर पहले से लगाई जाने वाली होलिका और चौपालों में फगुआ गीतों का राग रंग पहले जैसा नहीं दिख रहा। दो, तीन दशक पहले लगभग सभी गांवों में वसंत पंचमी के बाद से ही होलिका लगाने का कार्य शुरू कर दिया जाता था। गांव की चौपालों में भी ढोलक मजीरे के साथ जमने वाली फगुहारों की टोली और फागुनी गीतों की गूंज उठती थी, किंतु अब पहले जैसा माहौल नहीं दिख रहा।
आकाशवाणी दूरदर्शन से जुड़े और पारंपरिक गीतों पर शोध कर रहे लेखक और हास्य कवि महेवा गांव निवासी अशोक सिंह बेशरम ने बताया कि पहले फागुनी मौसम में बारहमासा, उलार धमार, बेलवरिया बेलवर, झूमर, नारदी, चहका, दुगुन, बैसवारा, ढाई लाल, डेढ़ताल, चौताल, चैता और चैती जैसे विविध प्रकार के गीतों का चलन रहा है। होलिका दहन के समय कबीरा, जोगीरा और उसके बाद गांव की गलियों में फगुहारों द्वारा गलियारा गीत गाने की परंपरा रही है।
धीरे-धीरे नई पीढ़ी और रील के जमाने में मनोरंजन के बदलते तौर तरीकों के चलते नए गायक पुरानी परंपरा से नहीं जुड़ पा रहे। वहीं गांवों में आपसी प्रतिस्पर्धा और द्वेष के चलते भी होलिका लगाने और मिल बैठकर फागुनी गीत गाने की परंपरा सिमट रही है।