इलाहाबाद। जिला पंचायत चुनाव में आरक्षण लागू करने के खिलाफ दाखिल याचिकाओं की सुनवाई के अधिकार को लेकर संवैधानिक प्रश्न खड़ा हो गया है। चुनाव अधिसूचना जारी होने के बाद अदालत को निर्वाचन प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने का अधिकार है अथवा नहीं इस प्रश्न को वृहद पीठ को संदर्भित कर दिया गया है।
पंचायत चुनाव के खिलाफ दाखिल याचिकाएं हाईकोर्ट की कुछ खंडपीठों से इस आधार पर खारिज की जा चुकी हैं कि अधिसूचना जारी होने के बाद न्यायालय को चुनाव में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है। जबकि न्यायमूर्ति अरुण टंडन और न्यायमूर्ति अश्विनी कुमार मिश्र की खंडपीठ ने न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति के तहत इस प्रश्न को विचारणीय माना है कि यदि चुनाव नियमविरुद्ध तरीके से कराया जा रहा है तो अदालत को उसकी न्यायिक समीक्षा का अधिकार होना चाहिए।
खंडपीठ ने इस प्रश्न को संदर्भित करते हुए मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया है कि वह अगले सप्ताह वृहदपीठ गठित कर सुनवाई कराएं। अदालत का मानना है कि जिला और क्षेत्र पंचायत के चुनाव में आरक्षण लागू करने में संविधान के अनुच्छेद 243(ओ) का उल्लंघन किया जा रहा है।
प्रदेश सरकार ने याचिका पर आपत्ति करते हुए कहा है कि अधिसूचना जारी होने के बाद हाईकोर्ट को अनुच्छेद 226 के तहत इस मामले की सुनवाई का अधिकार नहीं है। पीठ ने सवाल उठाया कि गलत आरक्षण लागू करने से जिनके अधिकारों का हनन हो रहा है, उनको क्या उपचार प्राप्त है। यदि इसके खिलाफ विकल्प उपलब्ध नहीं है तो अदालत की अधिकारिता पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता है। इस प्रश्न का वृहदपीठ में समाधान होना चाहिए। हालांकि अदालत ने किसी प्रकार का अंतरिम आदेश याचिका में पारित नहीं किया है। आरक्षण लागू करने के खिलाफ याचिकाओं की सुनवाई का मामला अब वृहदपीठ में तय होगा।