इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि अनुबंध के आधार पर अगर सरकार बकाए की बात स्वीकार करती है तो याचिका पोषणीय है। संविधान की धारा 226 के तहत ऐसे बकाए के लिए याचिकाएं स्वीकार योग्य हैं और उन पर सुनवाई कर आदेश दिए जाने का अधिकार है। यह आदेश न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने मेरठ की एजेंसी कनिका कंस्ट्रक्शन की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।
हाईकोर्ट के समक्ष याची की ओर से अनुबंध के तहत बकाए के भुगतान के संबंध में निर्देश देने की मांग की गई थी। याची का कहना है कि कोविड की पहली लहर के दौरान बैजल भवन, मेरठ और ओलिविया होटल में सामुदायिक किचन की सेवाएं प्रदान करने के लिए जिला प्रशासन केसाथ अनुबंध किए गए थे। सेवाओं के बदले में कुल तीन करोड़, 68 लाख, 81 हजार, 217 रुपये जिला प्रशासन को देने थे।
लेकिन जिला प्रशासन ने 37 लाख, 32 हजार, 72 रुपये का भुगतान किया। शेष भुगतान सरकार द्वारा बजट आवंटित होने के बाद करने को कहा गया। याची की ओर से कहा गया कि पर्याप्त समय बीत जाने के बाद भी भुगतान नहीं हुआ। याची की ओर से कोर्ट में यह याचिका अनुच्छेद 226 के तहत दाखिल कर भुगतान के लिए निर्देश दिए जाने की मांग की गई।
कोर्ट ने याचिका को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत पोषणीय पाया और कहा क्योंकि, अनुबंध के आधार पर एजेंसी ने अनुबंधों के दायित्वों का पूरा निर्वहन किया, लिहाजा वह अपने बकायों का भुगतान प्राप्त करने की हकदार है।
सरकार भी अनुबंधों के आधार पर बकाए की बात स्वीकार कर रही है। हाईकोर्ट ने इस मामले में मेसर्स सौभाग्य इंडस्ट्रीज लिमिटेड के मामले का संदर्भ लिया। हाईकोर्ट ने इस आधार पर याचिका को स्वीकार करते हुए सरकार को चार हफ्ते में बकाया रकम का भुगतान करने का आदेश दिया।