इलाहाबाद(ब्यूरो)। जिला पंचायत चुनाव में 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण लागू करने के मामले में हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान एक नया मोड़ आ गया है। हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार के सामने प्रश्न रखा है कि ग्राम पंचायतों का गठन किए बिना जिला पंचायत चुनाव कैसे कराएंगे, क्योंकि जिला पंचायत चुनाव में ग्राम प्रधान की भी भूमिका होती है। कोर्ट ने प्रदेश सरकार के इस प्रश्न पर भी जवाब मांगा है कि जब ग्राम पंचायतों का जातिगत डाटा उनके पास मौजूद है तो फिर जिला पंचायत के लिए अलग से डाटा उपलब्ध नहीं होने की बात करने का क्या औचित्य है। इस प्रकरण पर लेकर दाखिल दर्जनों याचिकाओं पर न्यायमूर्ति अरुण टंडन और न्यायमूर्ति अश्विनी कुमार मिश्र की खंडपीठ सोमवार को भी सुनवाई जारी रखेगी।
वहीं ग्राम पंचायत चुनाव को लेकर दाखिल कई याचिकाएं मुख्य न्यायमूर्ति डॉ. डीवाई चंद्रचूड और न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की खंडपीठ ने यह कहते हुए खारिज कर दी कि चुनाव की अधिसूचना जारी हो जाने के बाद यह याचिकाएं अर्थहीन हो चुकी हैं। ग्राम पंचायतों में चक्रानुक्रम में आरक्षण लागू करने की मांग में दाखिल याचिकाओं पर मुख्य न्यायमूर्ति की खंडपीठ पांच अक्तूबर को सुनवाई करेगी।
प्रदेश सरकार से इस मामले में जवाब मांगा गया है। प्रदेश सरकार का कहना था कि नियमों में बदलाव होने के कारण सीटों का आरक्षण नए सिरे से किया जा रहा है इसे नौ अक्तूबर तक अंतिम रूप दे दिया जाएगा। कोर्ट का कहना था कि नई जोड़ी गई ग्राम पंचायतों के लिए नए सिरे से आरक्षण लागू किया जा सकता है मगर पुरानी ग्राम पंचायतों का आरक्षण चक्रानुक्रम के अनुसार ही किया जाना चाहिए। सीटों के आरक्षण और रोटेशन की व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 243 डी के तहत है इसे सरकार बदल नहीं सकती है। कोर्ट ने याची को अनुमति दी है कि वह संशोधित नियम को चुनौती दे सकता है।