हाथी, घोड़े और ऊंट पर निकलती थी शाही सवारी
1838 के कुंभ के बारे में ब्रिटिश इंजीनियर डेविडसन अपने रोजनामे में लिखते हैं, प्रयाग की रेती पर पहुंचा तो बहुत-सी अस्थाई झोपड़ियां थीं। यह बांस और घास-फूस की बनी थीं। बीच-बीच में ईंधन के ढेर थे, जो बहुत महंगे बिकते थे। मेला करीब आधे मील तक फैला था।
कलकत्ता क्रिश्चियन ऑब्जर्वर में एक ईसाई मिशनरी 1840 में लिखते हैं, उन्होंने कुंभ में दस दिन बिताए। कुंभ शुरू होने से बहुत पहले ही दलों (अखाड़ों) के संत अपने स्थान चुनकर तैयारी शुरू कर देते थे। अखाड़े के बड़े हाथियों पर निकलते थे। पीछे उनके शिष्य और साधु कुछ शानदार घोड़ों और ऊंटों पर भी सवार होते थे।