इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज पीड़िता का बयान (कलमबंद बयान) पत्थर की लकीर है। इसे महज आरोपों के आधार पर बार-बार बदला नहीं जा सकता। लिहाजा, मजिस्ट्रेट को दोबारा बयान दर्ज करने का आदेश नहीं दिया जा सकता।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज पीड़िता का बयान (कलमबंद बयान) पत्थर की लकीर है। इसे महज आरोपों के आधार पर बार-बार बदला नहीं जा सकता। लिहाजा, मजिस्ट्रेट को दोबारा बयान दर्ज करने का आदेश नहीं दिया जा सकता।
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इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति राजीव गुप्ता और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने आजमगढ़ की पीड़िता की याचिका खारिज कर दी।आजमगढ़ के रानी सराय थाने में दर्ज एक मुकदमे की पीड़िता ने हाईकोर्ट से गुहार लगाई थी कि निचली अदालत के आदेश के क्रम में उसका बयान दोबारा दर्ज कराया जाए। उसने दावा किया था कि पहले दर्ज बयान में प्रक्रियागत खामियां थीं। आरोप लगाया कि मजिस्ट्रेट ने उसका बयान सही तरह से दर्ज नहीं किया और उसे पढ़कर भी नहीं सुनाया गया। कोर्ट ने यह मांग सिरे से खारिज कर दी।
बयान दोबारा दर्ज कराना कानून का मजाक
कोर्ट ने कहा कि धारा-183 बीएनएनएस के तहत मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज बयान की अपनी एक पवित्रता और कानूनी गरिमा है। अगर हर मामले में पीड़िता के यह कहने भर से कि बयान सही नहीं लिखा गया, दोबारा दर्ज करना शुरू कर दिया गया तो यह कानूनी प्रक्रिया का मजाक होगा। असाधारण परिस्थितियों को छोड़कर, यह बयान केवल एक बार ही दर्ज किया जाता है।
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हाईकोर्ट ने क्यों ठुकराई मांग
कोर्ट ने जब मजिस्ट्रेट की ओर से दर्ज मूल बयान की प्रमाणित कॉपी देखी तो पाया कि पीड़िता ने बयान के नीचे खुद हस्ताक्षर किए थे। उसमें स्पष्ट लिखा था कि पीड़िता ने बयान स्वयं पढ़ा है। मजिस्ट्रेट ने प्रमाणित किया था कि बयान बिना किसी दबाव या डर के दिया गया है।