इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य में पुलिस अधिकारियों की ओर से कोर्ट के समक्ष समय पर चोट की रिपोर्ट न पहुंचाने पर नाराजगी व्यक्त की है। कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि पुलिस की इस कार्यप्रणाली में तत्काल सुधार नहीं हुआ, तो कोर्ट उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) और अपर मुख्य सचिव (गृह) को व्यक्तिगत रूप से तलब करने के लिए मजबूर होगा। यह आदेश न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने अरुण शुक्ला की याचिका को खारिज करते हुए दिया है।
प्रयागराज निवासी याची ने करछना थाने में दर्ज एक एफआईआर को चुनौती दी थी। मामले की सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने पाया कि प्रदेश के विभिन्न जिलों में पुलिस अधिकारी केस डायरी के महत्वपूर्ण हिस्से, जैसे चोट की रिपोर्ट को समय पर कोर्ट में प्रस्तुत नहीं करते हैं। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि वह हर मामले में जिले के निरीक्षकों और पुलिस अधीक्षकों को इन रिपोर्ट की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए बार-बार समन जारी नहीं कर सकता।
इस स्थिति को देखते हुए न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि अब सीधे शासन के शीर्ष अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाएगी। कोर्ट ने अपने आदेश की प्रति रजिस्ट्रार (अनुपालन) के माध्यम से 24 घंटे के भीतर डीजीपी और अपर मुख्य सचिव (गृह) को भेजने का निर्देश दिया, ताकि इस संबंध में सुधारात्मक कदम उठाए जा सकें।
याचिका पर खंडपीठ ने कहा कि एफआईआर के अवलोकन से पता चलता है कि संपत्ति विवाद के कारण प्रथम सूचनाकर्ता पर तेजाब से हमला करने की साजिश रची गई थी। इस मामले में रोहित शर्मा मुख्य हमलावर था, जबकि याचिकाकर्ता अरुण शुक्ला सक्रिय साजिशकर्ताओं में शामिल था। अदालत ने टिप्पणी की कि जिन अपराधों में एसिड का उपयोग हथियार के रूप में होता है, उन्हें गंभीर और घातक प्रकृति के कारण एक विशेष श्रेणी में रखा जाना चाहिए। चूंकि, मामला गंभीर अपराध और साजिश से जुड़ा है, इसलिए कोर्ट ने इसे हस्तक्षेप के योग्य नहीं माना और याचिका को खारिज कर दिया।