इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 38 साल पुराने हत्या के प्रयास के एक मामले में तीन आरोपियों की दोषसिद्धि को बरकरार रखा है, लेकिन उनकी चार वर्ष की कारावास की सजा रद्द कर उन्हें प्रोबेशन पर रिहा करने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि आरोपियों के खिलाफ अपराध साबित होता है, लेकिन उनकी वर्तमान आयु, लंबे समय से लंबित मुकदमा और आपराधिक इतिहास न होने जैसी परिस्थितियों को देखते हुए उन्हें सुधार का अवसर दिया जाना उचित होगा। यह आदेश न्यायमूर्ति संतोष राय ने सुबोध कुमार और अन्य की अपील पर दिया है।
मैनपुरी निवासी अपीलकर्ताओं के खिलाफ आरोप है कि 1986 में रास्ते के विवाद को लेकर वादी अनवर सिंह के घर पहुंचकर फायरिंग और हमला किया था। घटना में अनवर सिंह समेत उनके परिवार के कई सदस्य घायल हुए थे। पुलिस जांच के बाद आरोपियों के खिलाफ हत्या के प्रयास का मुकदमा दर्ज किया गया था।
सत्र न्यायालय ने वर्ष 1988 में सुबोध कुमार, महेंद्र सिंह और राजेश कुमार को हत्या का प्रयास में दोषी ठहराते हुए चार-चार वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट ने पक्षों को सुनने व रिकॉर्ड पर मौजूद प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, मेडिकल रिपोर्ट और अन्य साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद पाया कि आरोपियों की संलिप्तता संदेह से परे साबित होती है। अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट की ओर से दर्ज दोषसिद्धि पूरी तरह न्यायोचित है और उसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
हालांकि अदालत ने पाया कि सभी आरोपी लगभग 60 वर्ष की आयु पार कर चुके हैं। उनका पूर्व आपराधिक इतिहास नहीं है। इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तीनों आरोपियों को एक वर्ष की अवधि के लिए प्रोबेशन पर रिहा करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि यदि प्रोबेशन की किसी भी शर्त का उल्लंघन किया गया तो आरोपियों को ट्रायल कोर्ट की ओर से सुनाई गई मूल सजा भुगतनी होगी।