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हाईकोर्ट : जब्त वाहन से छापा मारने पर हाईकोर्ट हैरान, डीजीपी को पुलिस जांच का आदेश दिए

Sat, 26 Sep 2026 02:34 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

जिस वाहन को पुलिस ने आबकारी मामले में जब्त किया था, उसी को थाने से बाहर निकालकर वांछित आरोपी की तलाश में इस्तेमाल किया गया। तीन दिन बाद वाहन हादसे का शिकार हो गया और एक महिला की मौत हो गई। मामले में पुलिस की भूमिका पर सवाल उठने के बाद हाईकोर्ट ने डीजीपी को स्वतंत्र और गोपनीय जांच के आदेश दिए हैं।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक।
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विस्तार
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आबकारी मामले में जब्त वाहन से छापा मारने पर हैरानी जताते हुए डीजीपी को पुलिस के खिलाफ स्वतंत्र और गोपनीय जांच का आदेश दिया है। जांच रिपोर्ट आठ हफ्ते में दाखिल करना होगा। जब्त वाहन हादसे का शिकार हो गया था। इसमें एक महिला की जान चली गई थी। यह आदेश न्यायमूर्ति अनिल कुमार की एकल पीठ ने राहुल उर्फ धर्मदेव की याचिका पर दिया है।

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मामला बुलंदशहर के रामघाट थाना क्षेत्र का है। याची पर 19 पेटी देशी शराब ले जाने का आरोप था। उसके खिलाफ उत्तर प्रदेश आबकारी अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज की गई। इसके बाद वाहन जब्त कर लिया गया। आबकारी अधिनियम की धारा 72 के तहत उसकी कुर्की की कार्रवाई शुरू हुई। जिला मजिस्ट्रेट ने बाद में वाहन को कुर्क करते हुए उसका बाजार मूल्य 6.45 लाख रुपये आंका था। याची ने इस आदेश को अपीलीय अदालत में चुनौती दी, लेकिन वहां भी उसे राहत नहीं मिली। इसके खिलाफ उसने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

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चार जून को थाने से निकला, सात जून को हुआ हादसा

सुनवाई के दौरान सामने आया कि जब्त वाहन को चार जून 2021 को रामघाट थाने से बाहर निकाला गया था। राज्य की ओर से बताया गया कि तत्कालीन हेड मुहर्रिर सीताराम ने दो सिपाहियों पंकज राणा और नरेंद्र सिंह को वांछित आरोपी की तलाश के लिए वाहन दिया था। दावा किया गया कि यह तत्कालीन थाना प्रभारी वीरेंद्र सिंह की जानकारी के बिना हुआ। तीन दिन बाद वाहन मथुरा के राया थाना क्षेत्र में हादसे का शिकार हो गया। हादसे में मनोज कुमार के माता-पिता गंभीर रूप से घायल हुए। बाद में उनकी मां की मौत हो गई। मामले में एफआईआर दर्ज हुई और वाहन फिर जब्त कर लिया गया।

राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि हेड मुहर्रिर और दोनों सिपाहियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई कर सेवा अभिलेख में निंदा प्रविष्टि की गई थी। हालांकि, कोर्ट ने प्रथम दृष्टया इसे पर्याप्त नहीं माना। कोर्ट ने कहा कि यदि जब्त वाहन को बिना वैध अधिकार के बाहर निकाला गया था तो यह केवल प्रक्रिया संबंधी चूक नहीं, बल्कि सौंपी गई हिरासत के गंभीर उल्लंघन का मामला हो सकता है। लिहाजा, डीजीपी मामले की स्वतंत्र और गोपनीय जांच करवाए।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि डीजीपी की जांच में यह भी देखा जाएगा कि वाहन को थाने से कैसे निकाला गया, संबंधित पुलिसकर्मियों और तत्कालीन थाना प्रभारी की क्या भूमिका थी, तत्कालीन एसएसपी की भूमिका क्या रही तथा विभागीय कार्रवाई निष्पक्ष और पर्याप्त थी या नहीं। यह भी जांच होगी कि घटनाक्रम से किसी आपराधिक अपराध का प्रथम दृष्टया पता चलता है या नहीं।
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