इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को बतौर आरोपी तलब करना कोई औपचारिक कार्य नहीं, बल्कि गंभीर न्यायिक जिम्मेदारी है। बिना तथ्यों, साक्ष्यों और कानून पर विचार किए पारित समन आदेश न्यायिक विवेक का उल्लंघन है। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति जय प्रकाश तिवारी की एकल पीठ ने जालौन में तैनात रहे उपनिरीक्षक अजय कुमार के खिलाफ न्यायिक मजिस्ट्रेट की ओर से जारी समन आदेश को रद्द कर दिया।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट की अदालत को समन जारी करते वक्त यह स्पष्ट करना होगा कि उन्होंने सीआरपीसी की धारा-200 और 202 (पुराने मामले) के तहत दर्ज बयानों, साक्ष्यों व आरोपों की प्रकृति पर गंभीरता से विचार किया है। मात्र औपचारिक आदेश पारित करना कानून की मंशा के खिलाफ है। मामला जालौन के डाकोर थाना क्षेत्र का है। याची के खिलाफ मारपीट के आरोप में दाखिल परिवाद का संज्ञान लेते हुए मजिस्ट्रेट की अदालत ने बतौर आरोपी तलब किया था। इस आदेश के खिलाफ याची ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
अधिवक्ता ने दलील दी कि याची ने शिकायतकर्ता का शांतिभंग के आरोप में चालान किया था। यह कर्तव्यों के पालन की दिशा में की गई कार्रवाई थी। इससे खफा शिकायतकर्ता ने झूठे आरोप में शिकायत दर्ज कराई है। जबकि, शिकायतकर्ता और उसके पिता के खिलाफ पहले से कई आपराधिक मामले लंबित हैं। मजिस्ट्रेट की अदालत ने इस तथ्य को नजरअंदाज कर पुलिस अधिकारी के खिलाफ समन जारी किया है। कोर्ट ने पाया कि समन आदेश में न तो साक्ष्यों की चर्चा की और न ही न्यायिक विवेक के साथ आरोपों की सत्यता की जांच की। लिहाजा, कोर्ट ने पुलिस अधिकारी के खिलाफ जारी समन आदेश को रद्द कर दिया। साथ ही नए सिरे से सुनवाई के लिए मामला मजिस्ट्रेट की अदालत में वापस भेज दिया।