पुलिस जांच में आरोपों की पुष्टि नहीं हुई और फाइनल रिपोर्ट दाखिल कर दी। हालांकि, शिकायतकर्ता की ओर से दाखिल प्रोटेस्ट पिटीशन पर न्यायिक मजिस्ट्रेट ने महिला को समन जारी कर दिया। ऐसे में महिला ने समन आदेश सहित मुकदमे की पूरी कार्यवाही रद्द करने की मांग करते हुए हाईकोर्ट में अर्जी दायर की।
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने झूठी सूचना देने वाले शिकायतकर्ता और गवाहों के खिलाफ लिखित शिकायत दर्ज करने की बात कही। साथ ही कहा कि मामले में लगाए गए आरोप गैर-संज्ञेय अपराधों से संबंधित थे, जिनमें पुलिस बिना मजिस्ट्रेट की अनुमति के एफआईआर दर्ज कर जांच नहीं कर सकती। इसके बावजूद एफआईआर दर्ज की गई। मजिस्ट्रेट ने इसे राज्य का मामला मानकर संज्ञान ले लिया, जबकि इसे शिकायत वाद के रूप में चलाया जाना चाहिए था। कोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया को संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन बताया।