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High Court : हाईकोर्ट सख्त- झूठी एफआईआर दर्ज कराने वालों पर अनिवार्य रूप से दर्ज कराएं परिवाद

Thu, 15 Jan 2026 08:10 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि जांच में आरोपी के खिलाफ साक्ष्य नहीं मिलता और फाइनल रिपोर्ट दाखिल होती है तो विवेचना अधिकारी झूठी सूचना देने वाले शिकायतकर्ता व गवाहों के खिलाफ अनिवार्य रूप से परिवाद दर्ज कराएं।
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अदालत(सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि जांच में आरोपी के खिलाफ साक्ष्य नहीं मिलता और फाइनल रिपोर्ट दाखिल होती है तो विवेचना अधिकारी झूठी सूचना देने वाले शिकायतकर्ता व गवाहों के खिलाफ अनिवार्य रूप से परिवाद दर्ज कराएं। साथ ही यह भी निर्देश दिया है कि मजिस्ट्रेट तब तक फाइनल रिपोर्ट स्वीकार नहीं करेंगे जब तक उसके साथ झूठी शिकायत करने वाले के खिलाफ कार्रवाई की लिखित शिकायत न हो। कोर्ट ने कहा कि इन निर्देशों का पालन न करना कोर्ट की अवमानना मानी जाएगी।

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यह आदेश न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि ने अलीगढ़ निवासी एक महिला की याचिका पर दिया है। कहा, पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) पुलिस अधिकारियों को इस फैसले के अनुरूप आदेश जारी करें। साथ ही निर्देश दिया है कि सभी न्यायिक मजिस्ट्रेटों फाइनल रिपोर्ट प्रस्तुत होने पर शिकायतकर्ता को सुनें और विधि के अनुसार निर्णय लें।

अलीगढ़ निवासी याची महिला के खिलाफ उसके पति ने क्वार्सी थाने में मुकदमा दर्ज कराया था। शिकायतकर्ता पति दक्षिण कोरिया के सियोल में रहता है। उसने आरोप लगाया था कि पत्नी किसी अन्य के साथ रह रही है। इससे उसका तलाक हो गया है। अब पत्नी और उसका साथी उसकी बेटी को सोशल मीडिया के माध्यम से बदनाम कर रहा है। साथ ही भारत आने पर जान से मारने की धमकी दे रहे हैं।

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पुलिस जांच में आरोपों की पुष्टि नहीं हुई और फाइनल रिपोर्ट दाखिल कर दी। हालांकि, शिकायतकर्ता की ओर से दाखिल प्रोटेस्ट पिटीशन पर न्यायिक मजिस्ट्रेट ने महिला को समन जारी कर दिया। ऐसे में महिला ने समन आदेश सहित मुकदमे की पूरी कार्यवाही रद्द करने की मांग करते हुए हाईकोर्ट में अर्जी दायर की।

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने झूठी सूचना देने वाले शिकायतकर्ता और गवाहों के खिलाफ लिखित शिकायत दर्ज करने की बात कही। साथ ही कहा कि मामले में लगाए गए आरोप गैर-संज्ञेय अपराधों से संबंधित थे, जिनमें पुलिस बिना मजिस्ट्रेट की अनुमति के एफआईआर दर्ज कर जांच नहीं कर सकती। इसके बावजूद एफआईआर दर्ज की गई। मजिस्ट्रेट ने इसे राज्य का मामला मानकर संज्ञान ले लिया, जबकि इसे शिकायत वाद के रूप में चलाया जाना चाहिए था। कोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया को संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन बताया।
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