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हाईकोर्ट ने कहा : संविदा पर तीन साल काम करने मात्र से नियमित नियुक्ति का कानूनी अधिकार नहीं

Fri, 04 Sep 2026 03:36 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कोर्ट ने कहा कि संविदा पर करीब तीन साल काम करने मात्र से कर्मचारियों को सेवा में बने रहने या नियमित नियुक्ति का कानूनी अधिकार नहीं मिल जाता।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कोर्ट ने कहा कि संविदा पर करीब तीन साल काम करने मात्र से कर्मचारियों को सेवा में बने रहने या नियमित नियुक्ति का कानूनी अधिकार नहीं मिल जाता। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) के तहत संविदा पर नियुक्त बहुउद्देशीय स्वास्थ्य कार्यकर्ता (पुरुष) को राहत देने से इन्कार कर दिया है। न्यायमूर्ति विकास बुधवार ने कानपुर नगर निवासी अनिकेत पाठक और 139 अन्य समेत संबंधित याचिकाओं को खारिज कर दिया।

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मामले में याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति वर्ष 2012-13 में एनआरएचएम के तहत बहुउद्देशीय स्वास्थ्य कार्यकर्ता (पुरुष) के रूप में संविदा पर हुई थी। उन्हें छह हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय दिया जाता था। केंद्र सरकार ने वर्ष 2011 में 235 पिछड़े और अधिक बीमारी वाले जिलों में ऐसे स्वास्थ्य कर्मियों की तीन वर्ष के लिए संविदा नियुक्ति को मंजूरी दी थी। वर्ष 2014 में मिशन निदेशक ने आदेश जारी कर स्पष्ट किया था कि स्वास्थ्य कार्यकर्ता की संविदा सितंबर 2014 के बाद नहीं बढ़ाई जाएगी। याचियों ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी।

याचियों की ओर से कहा गया कि स्वास्थ्य एवं स्वच्छता से जुड़ा उनका काम निरंतर प्रकृति का है और राज्य में स्वास्थ्य कर्मियों के पद खाली हैं। उनका कहना था कि नियमित भर्ती होने तक उन्हें उन्हीं शर्तों पर काम करने दिया जाना चाहिए। उन्होंने नियमित नियुक्ति की मांग नहीं बल्कि अंतरिम तौर पर संविदा पर काम जारी रखने की मांग की। राज्य सरकार ने इसका विरोध किया।
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कोर्ट ने कहा कि याचियों की नियुक्ति संविदा पर थी और अनुबंध में एक माह के नोटिस पर सेवा समाप्त करने का प्रावधान भी था। इसलिए वे नियमित कर्मचारी के समान अधिकार का दावा नहीं कर सकते। कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी योजना को जारी रखना या बंद करना नियोक्ता के अधिकार क्षेत्र में है, जब तक उसमें मनमानी या भेदभाव न हो। याची यह साबित नहीं कर सके कि उन्हें सेवा में बने रहने का कोई कानूनी अधिकार प्राप्त है। इसलिए उन्हें मांगी गई राहत नहीं दी जा सकती।

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