इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 42 पुराने हत्या के मामले में दोषी की आजीवन कारावास की सजा को निरस्त कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने गैर-इरादतन हत्या के मामले में दोषसिद्धि और दो साल के कठोर कारावास की सजा को बरकरार रखा।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 42 पुराने हत्या के मामले में दोषी की आजीवन कारावास की सजा को निरस्त कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने गैर-इरादतन हत्या के मामले में दोषसिद्धि और दो साल के कठोर कारावास की सजा को बरकरार रखा।
विज्ञापन
कोर्ट ने आरोपी की जमानत निरस्त कर उसे शेष सजा काटने के लिए ट्रायल कोर्ट को हिरासत में लेने का आदेश दिया। यह आदेश न्यायमूर्ति चंद्र धारी सिंह एवं न्यायमूर्ति लक्ष्मीकांत शुक्ला की खंडपीठ ने रामकिशन व अन्य की आपराधिक अपील पर दिया। अपील लंबित रहने के दौरान दो याचियों रामकिशन और काशीराम की मृत्यु हो चुकी थी। जिसके कारण उनके संबंध में अपील समाप्त हो गई।
अभियोजन के अनुसार 27 जून 1984 को रामपुर के केमरी थाना क्षेत्र अंतर्गत पुरानी रंजिश को लेकर मारपीट हुई थी। बीच-बचाव करने पहुंचे नजर सिंह हमले में घायल हो गए थे। उपचार के दौरान पांच जुलाई 1984 को नई दिल्ली के एम्स में उनकी मृत्यु हो गई। ट्रायल कोर्ट ने रोशन समेत सभी आरोपियों को हत्या के मामले में दोषी मानते हुए आजीवन कारावास और गैर-इरादतन हत्या के मामले में दो साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।
विज्ञापन
कोर्ट ने कहा कि अभियोजन यह संदेह से परे सिद्ध नहीं कर सका कि मृतक को मिली घातक चोटें उसी घटना में लगी थीं। हत्या के आरोप में दोषसिद्धि कायम नहीं रखी जा सकती। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि घायल प्रथम सूचना दाता के शरीर पर 11 चोटें थीं और प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही चिकित्सकीय साक्ष्य से पुष्ट होती है। लोगों की ओर सिर सहित शरीर के विभिन्न हिस्सों पर किए गए हमले से यह स्पष्ट है कि आरोपी का कृत्य गैर-इरादतन हत्या के प्रयास के दायरे में आता है।
कोर्ट ने हत्या के प्रयास के मामले में रोशन की दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखते हुए ट्रायल कोर्ट को आरोपी को हिरासत में लेकर शेष सजा पूरी कराने के निर्देश दिए।