इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति की मृत्यु का पंजीकरण एक वर्ष के भीतर नहीं कराया गया है तो प्रमाणपत्र जारी करने के लिए एसडीएम का आदेश अनिवार्य है। इसी टिप्पणी संग कोर्ट ने पत्नी का मृत्यु प्रमाणपत्र जारी कराने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी।
यह आदेश न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने नवल किशोर की याचिका पर दिया है। वाराणसी निवासी याची का विवाह वर्ष 1962 में माधुरी से हुआ था। कुछ समय बाद ही पत्नी मायके चली गई और फिर नहीं लौटी। दावा है कि वर्ष 2001 में वाराणसी के रामनगर स्थित मायके में पत्नी की मृत्यु हो गई थी। याची ने दूसरी शादी कर ली।
वायुसेना से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने दूसरी पत्नी का नाम दस्तावेज में दर्ज कराने का प्रयास किया तो उनसे पहली का मृत्यु प्रमाणपत्र मांगा गया। याची ने पार्षद की ओर से जारी प्रमाणपत्र के आधार पर मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने की मांग कर नगर निगम में आवेदन किया, जिसे खारिज कर दिया गया। इस फैसले को याची ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
राज्य सरकार और नगर निगम की ओर से वकील ने दलील दी कि जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण अधिनियम-1969 और उत्तर प्रदेश जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण नियमावली-2002 के तहत यदि मृत्यु का पंजीकरण एक वर्ष से अधिक समय बाद कराया जाना हो तो संबंधित एसडीएम का आदेश जरूरी है। बिना इस प्रक्रिया के मृत्यु प्रमाण पत्र जारी नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने राज्य सरकार व नगर निगम की दलीलों को सही माना। कहा पार्षद की ओर से जारी प्रमाण पत्र या स्वयं का शपथ पत्र मृत्यु का वैध और पर्याप्त प्रमाण नहीं माना जा सकता।