इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई को लेकर टिप्पणी करते हुए कहा कि कर्मचारी को मौखिक सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का अभिन्न हिस्सा है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई को लेकर टिप्पणी करते हुए कहा कि कर्मचारी को मौखिक सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का अभिन्न हिस्सा है। यह आदेश न्यायमूर्ति अनीश कुमार गुप्ता की एकल पीठ ने झांसी के लेखपाल रामस्वरूप शुक्ला की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।
विज्ञापन
कोर्ट ने पाया कि जांच अधिकारी ने चार्जशीट के जवाब के बाद कर्मचारी को व्यक्तिगत सुनवाई के लिए न तो कोई तिथि निर्धारित की और न ही मौखिक पक्ष रखने का अवसर दिया। इसे गंभीर त्रुटि मानते हुए कोर्ट ने 17 दिसंबर 2009 को पारित बर्खास्तगी आदेश और 30 अप्रैल 2010 को अपीलीय प्राधिकारी की ओर से पारित आदेश को निरस्त कर दिया।
याची की नियुक्ति 1980 में लेखपाल के पद पर हुई थी और वह झांसी क्षेत्र में तैनात था। राजस्व निरीक्षक की शिकायत पर 2008 में उसके खिलाफ धोखाधड़ी समेत विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया था। इसके बाद विभागीय कार्रवाई कर एसडीएम ने उसकी सेवा समाप्त कर दी थी। कोर्ट ने कहा कि याची नौ जनवरी 2018 को सेवानिवृत्त हो चुका है। ऐसे में सेवा में पुनर्बहाली संभव नहीं है। साथ ही विभागीय कार्रवाई को अवैध ठहराते हुए बर्खास्तगी का आदेश रद्द कर दिया।