इस आदेश के खिलाफ अलीगढ़ के आयुक्त की अदालत में पुनरीक्षण अर्जी दाखिल की हुई, जिसे अपर आयुक्त ने राजस्व परिषद को संदर्भित कर दिया था। इसे 17 जनवरी 1997 को निरस्त करते हुए मामला पुर्नविचार के लिए डीएम के पास वापस भेजने का आदेश पारित कर दिया गया। याची ने इस आदेश का वापस लेने की अर्जी दी तो राजस्व परिषद ने उसे भी खारिज कर दिया।
जिसके खिलाफ याची ने वर्ष 2004 में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याची के वकील सुरेश मौर्या ने दलील दी कि उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन व भू-राजस्व संहिता की धारा 198 (6) के मुताबिक नवंबर 1980 से पूर्व आवंटित पट्टों के खिलाफ आपत्तियां दाखिल किए जाने की अवधि सात वर्ष निर्धारित है। वहीं, मौजूदा मामले में 15 साल बाद आपत्तियां उठाई गई है, जो अवैधानिक हैं।
जबकि राज्य सरकार के अतिरिक्त मुख्य स्थायी अधिवक्ता राजेश तिवारी और गांव सभा के वकील केके सिंह ने प्रतिवाद करते हुए कहा कि जांच आपत्तियों पर हुई जांच के दौरान याची अपात्र पाया गया, जिसके कारण उसके पक्ष में दिया गया पट्टा रद्द किया गया है।
कोर्ट ने रिषि पाल व अन्य के मामले में पारित विधि व्यवस्था और उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन और भू-राजस्व संहिता के प्रावधानों का हवाला देते हुए याचिका स्वीकार कर ली और अपर जिलाधिकारी द्वारा पारित पट्टा निरस्तीकरण के आदेश को रद्द कर दिया।