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UP: हाईकोर्ट की टिप्पणी- सजा इतनी भी कम न हो कि मजाक लगे, इतनी अधिक भी न हो कि सुधार की गुंजाइश ही खत्म हो जाए

Sun, 15 Feb 2026 01:19 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

Allahabad High Court :इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि दहेज हत्या के हर मामले में उम्रकैद की अधिकतम सजा देना जरूरी नहीं है। सजा न तो इतनी कम हो कि मजाक लगे और न ही इतनी कठोर कि सुधार की गुंजाइश खत्म हो जाए।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि दहेज हत्या के हर मामले में उम्रकैद की अधिकतम सजा देना जरूरी नहीं है। सजा न तो इतनी कम हो कि मजाक लगे और न ही इतनी कठोर कि सुधार की गुंजाइश खत्म हो जाए। लिहाजा, सजा हमेशा अपराध की प्रकृति और परिस्थितियों के अनुरूप होनी चाहिए।इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति सलिल कुमार राय और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने 10 साल से दहेज हत्या में उम्रकैद की सजा काट रहे बिजनौर निवासी शकील अहमद और उनके बेटे शेरबाज उर्फ शादाब की आपराधिक अपील आंशिक रूप से स्वीकार कर ली।

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कोर्ट उनकी उम्रकैद की सजा को जेल में बताई गई अवधि तक सीमित करते हुए तत्काल रिहा करने का आदेश दिया है। मामला बिजनौर के चांदपुर थाना क्षेत्र का है। शेरबाज का निकाह नाजिया के साथ दिसंबर 2014 में हुआ था। अप्रैल 2015 में संदिग्ध परिस्थितियों में जलने से उसकी मौत हो गई। मायके पक्ष ने आरोप लगाया कि दो लाख रुपये और बाइक की मांग पूरी न होने पर उसे जलाया गया। ट्रायल कोर्ट ने 2018 में पति और ससुर को उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसे दोषियों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

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