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हाईकोर्ट की टिप्पणी : पितृसत्ता के अवशेष हैं विवाह के लिए पुरुष की उम्र 21 व महिला की 18

Fri, 08 Nov 2024 04:20 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

कोर्ट ने कहा कि इससे एक विधायी धारणा यह प्रतीत होती है कि वैवाहिक रिश्ते में पति-पत्नी में से पुरुष बड़ा होगा और परिवार के खर्चों को चलाने का वित्तीय बोझ उठाएगा। उसकी महिला साथी बच्चे को जन्म देने वाली बनी रहेगी।
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अदालत। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पुरुषों के लिए विवाह की आयु 21 वर्ष व महिलाओं के लिए 18 वर्ष, यह अंतर पितृसत्ता के अवशेष के अलावा और कुछ नहीं है। विधायी मंशा पुरुषों को अपनी शिक्षा पूरी करने और परिवार की जिम्मेदारी उठाने के लिए वित्तीय स्वतंत्रता हासिल करने के लिए अतिरिक्त तीन साल की अनुमति देना है। यह महिलाओं को समान अवसर से वंचित करने जैसा है।

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कोर्ट ने कहा कि इससे एक विधायी धारणा यह प्रतीत होती है कि वैवाहिक रिश्ते में पति-पत्नी में से पुरुष बड़ा होगा और परिवार के खर्चों को चलाने का वित्तीय बोझ उठाएगा। उसकी महिला साथी बच्चे को जन्म देने वाली बनी रहेगी। न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह व न्यायमूर्ति डी. रमेश की खंडपीठ ने गौतम बुद्ध नगर के संजय चौधरी की अपील पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की।

गौतमबुद्ध नगर के संजय चौधरी की 2004 में शादी हुई। उस समय उनकी उम्र 12 साल थी और उनकी पत्नी केवल 9 साल की थी। बाल विवाह के आधार पर उन्होंने पारिवारिक न्यायालय में वाद दाखिल कर शादी को शून्य घोषित किए जाने की गुहार लगाई। पारिवारिक न्यायालय ने मुकदमा खारिज दिया। इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।

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याची के वकील ने दलील दी कि बाल विवाह निषेध अधिनियम विवाह के समय जो पक्ष बच्चा था, उसे यह अनुमति देता है कि वह घोषणा कर सके कि उसका विवाह शून्य था। वहीं, पत्नी के वकील ने दलील दी कि राहत का दावा सीमा अवधि के बाद किया गया है। अपीलकर्ता 2010 में 18 साल के हो गए थे। इसके तीन साल बाद 2013 में उन्होंने विवाह को शून्य घोषित करने के लिए वाद दाखिल किया।

न्यायालय ने कहा कि अपीलकर्ता के पास मुकदमा दायर करने के लिए 23 वर्ष की आयु तक की सीमा थी। मुकदमा शुरू करने की तिथि पर अपीलकर्ता की आयु 23 वर्ष से कम थी। यह निर्विवाद है कि जोड़े के बीच बाल विवाह हुआ था, इसलिए विवाह को शून्य घोषित किया जाता है। पत्नी ने 50 लाख का स्थायी गुजारा भत्ता मांगा था। लेकिन, न्यायालय ने एक महीने के भीतर 25 लाख रुपये का स्थायी गुजारा भत्ता भुगतान करने का आदेश दिया।
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