कोर्ट ने मामले में याची की पत्नी के माता-पिता की मध्यस्थता प्रक्रिया में एक खास प्रवृत्ति से आने पर नाराजगी जताई। कोर्ट ने पाया कि पत्नी के माता-पिता याची द्वारा मध्यस्थता केंद्र पर याची की ओर से जमा की गई राशि को प्राप्त करने की प्रवृत्ति से आ रहे हैं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गाजियाबाद जिले के विजयनगर थाने के निवासी फराज हसन पर मध्यस्थता केंद्र में सुनवाई तक पुलिस की सभी तरह की कार्रवाइयों पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने कहा है कि मामला पति-पत्नी के बीच का है। मध्यस्थता केंद्र में अगर दोनों के बीच की बर्फ की दीवार गिर जाए तो अच्छा है। यह आदेश न्यायमूर्ति राहुल चतुर्वेदी ने याची फराज हसन की अग्रिम जमानत अर्जी पर सुनवाई करते हुए दिया है।
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कोर्ट ने मामले में याची की पत्नी के माता-पिता की मध्यस्थता प्रक्रिया में एक खास प्रवृत्ति से आने पर नाराजगी जताई। कोर्ट ने पाया कि पत्नी के माता-पिता याची द्वारा मध्यस्थता केंद्र पर याची की ओर से जमा की गई राशि को प्राप्त करने की प्रवृत्ति से आ रहे हैं।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि मध्यस्थता प्रक्रिया में यदि पत्नी के माता-पिता भाग लेते हैं तो पूरी राशि उन्हें एक बार में नहीं सौंपी जाएगी। कोर्ट ने इसके लिए निर्देश दिया। कहा कि यदि पत्नी के माता-पिता केवल एक तिथि पर मध्यस्थता केंद्र आते हैं या बिना किसी उचित कारण के नहीं आते हैं तो याची द्वारा जमा की गई पूरी राशि का केवल 50 फीसदी उन्हें या उनके प्रतिनिधियों या उनके अधिवक्ता को सौंप दिया जाएगा और शेष राशि याची के पास रहेगी।
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यदि माता-पिता दो या दो से अधिक अवसरों पर मध्यस्थता केंद्र आते हैं तो याची द्वारा जमा की गई पूरी राशि के हकदार होंगे। मामले में विपक्षी पक्ष (पत्नी) के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि अस्वस्थ्य होने के कारण वह मध्यस्थता प्रक्रिया में नहीं शामिल हो सकती हैं। कोर्ट ने मध्यस्थता केंद्र को तीन महीने में मामले का निस्तारण का समय दिया।
मामले में विपक्षी पक्ष ने याची के खिलाफ गाजियाबाद के विजयनगर थाने में आईपीसी की धारा 498ए, 323, 308 और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत रिपोर्ट दर्ज कराई गई है। याची ने पुलिस की दंडात्मक कार्रवाई से बचने के लिए हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका दायर की है। मामला वैवाहिक होने की वजह से कोर्ट ने इसके निस्तारण के लिए पहले मध्यस्थता केंद्र भेजा है।