गाजियाबाद की हापुड़ तहसील के कपूरपुर गांव निवासी याची जगदीश को उसके मामा ने गोद लिया था। उनकी मृत्यु के बाद याची और उसकी मौसियों ने उप्र चकबंदी अधिनियम के अंतर्गत संपत्ति पर दावा कर आवेदन दायर किया। याची ने 25 अक्तूबर 1974 को किए गए गोदनामे के आधार पर स्वयं को मृतक का दत्तक पुत्र बताया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि एक जनवरी 1977 से पहले किए गए गोदनामे के लिए पंजीकरण की जरूरत नहीं है। उत्तर प्रदेश में चकबंदी कार्यवाही को इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि गोदनामे का पंजीकरण नहीं कराया गया। यह टिप्पणी कर न्यायमूर्ति चंद्र कुमार राय ने जगदीश की ओर दाखिल की गई 40 साल पुरानी याचिका स्वीकार कर ली।
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गाजियाबाद की हापुड़ तहसील के कपूरपुर गांव निवासी याची जगदीश को उसके मामा ने गोद लिया था। उनकी मृत्यु के बाद याची और उसकी मौसियों ने उप्र चकबंदी अधिनियम के अंतर्गत संपत्ति पर दावा कर आवेदन दायर किया। याची ने 25 अक्तूबर 1974 को किए गए गोदनामे के आधार पर स्वयं को मृतक का दत्तक पुत्र बताया। कहा कि वह इस संपत्ति का हकदार है। मौसियों का उस संपत्ति पर कोई हक नहीं।
चकबंदी अधिकारी ने याची के पक्ष में आदेश पारित किया। मौसियों ने इसके विरुद्ध अपील की, जो स्वीकार कर ली गई। याची ने अपील के खिलाफ पुनरीक्षण याचिका दायर की, जो खारिज कर दी गई। इसके खिलाफ याची ने 1984 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की। याची के अधिवक्ता विशाल अग्रवाल ने दलील दी कि एक जनवरी 1977 से पहले दिए गए गोदनामे का पंजीकरण जरूरी नहीं है। जब गोदनामा (दत्तक ग्रहण) हुआ तो उसके मामा की पत्नी ने कोई विरोध नहीं किया। आदेश साक्ष्यों पर विचार किए बिना पारित किया गया।
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वहीं, प्रतिवादी पक्ष ने दलील दी कि गोद लेने की परिस्थितियां संदिग्ध थीं और उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। गोद लेने के समय मृतक की पत्नी जीवित थी। इसके बाद भी सहमति नहीं ली गई। कोर्ट ने कहा कि चकबंदी अधिकारी ने सभी साक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए अपने आदेश पारित किए। उन्हें गोद लेने के कागजात के पंजीकरण की कोई आवश्यकता नहीं लगी। इस पर कोर्ट ने मुंदर बनाम उप निदेशक चकबंदी व अन्य मामलों का संज्ञान लेते हुए माना कि एक जनवरी 1977 से पहले के गोदनामे का पंजीकरण कराना आवश्यक नहीं है। याची का मृतक की संपूर्ण चल और अचल संपत्ति पर अधिकार है।