आरोपियों की दलील
याचियों के अधिवक्ता ने दलील दी कि 2016 में तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) शरिया कानून के तहत मान्य था। इस्लामी कानून के अनुसार निकाह हलाला एक वैध रस्म है। पीड़िता ने आपसी सहमति से तलाक की डिक्री ली थी, जिसमें उसने अपनी उम्र 24 वर्ष बताई थी, लिहाजा, वह निकाह के समय वह वयस्क थी। एफआईआर केवल पूर्व पति के साथ चल रहे बच्चे की कस्टडी और संपत्ति विवाद के कारण उसे और उसके परिजनों को फंसाने के लिए दर्ज कराई गई है। अभियोजन ने कहा कि याचियों पर नाबालिग संग सामूहिक दुष्कर्म का आरोप है। इसकी गहन जांच की आवश्यकता है। यह एक महिला के साथ-साथ समाज और मानवता के खिलाफ भी अपराध है।
कोर्ट का मत
आदेश के अंत में कोर्ट ने कहा कि अब तक जो भी तथ्य सामने आए हैं, वे अंतरात्मा को झकझोर देने वाले हैं। यहां सभी आरोपियों ने ऐसे गिरोह के रूप में जो भूमिका निभाई, वह प्रथम दृष्टया देश के कानूनों के खिलाफ है। कुछ की भूमिका सहायक या षड्यंत्रकारी के रूप में हो सकती है, लेकिन विवेचना के इस प्रारंभिक स्तर पर उन्हें एफआईआर रद्द कराने की मांग करने का हक नहीं है।