इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को लगातार इस तरह अपमानित और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाए कि उसकी पारिवारिक जिंदगी और सामाजिक सम्मान प्रभावित हो, तो ऐसी परिस्थितियां आत्महत्या के लिए उकसावे (दुष्प्रेरण) के दायरे में आ सकती हैं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को लगातार इस तरह अपमानित और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाए कि उसकी पारिवारिक जिंदगी और सामाजिक सम्मान प्रभावित हो, तो ऐसी परिस्थितियां आत्महत्या के लिए उकसावे (दुष्प्रेरण) के दायरे में आ सकती हैं।
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कोर्ट ने कहा कि आत्महत्या के लिए उकसावे का आरोप तय करने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि आरोपी घटना से ठीक पहले मृतक के संपर्क में रहा हो। कोर्ट ने बरेली की विशेष एससी/एसटी अदालत के उस आदेश को सही ठहराया। जिसमें आरोपी की डिस्चार्ज अर्जी खारिज कर दी गई थी। यह आदेश न्यायमूर्ति संतोष राय की अदालत ने बरेली निवासी चंद्रजीत सिंह की याचिका पर दिया।
आरोपी के खिलाफ आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण और एससी/एसटी अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज है। अभियोजन के अनुसार मृतक सोमराज की शादी 2017 में सह-आरोपी प्रिया उर्फ डॉली से हुई थी। आरोप है कि प्रिया के चंद्रजीत सिंह और एक अन्य व्यक्ति से अवैध संबंध थे। जिससे पति-पत्नी के बीच अक्सर विवाद होता था। शिकायत के मुताबिक, समझाने के बावजूद आरोपी लगातार मृतक को मानसिक रूप से प्रताड़ित करते रहे, जिससे वह गहरे तनाव में आ गया।
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18 जून 2018 को सोमराज अपने कमरे में फंदे से लटका मिला। घटनास्थल से मिले हस्तलिखित सुसाइड नोट में उसने अपनी पत्नी, चंद्रजीत और गुलशन को अपनी मौत के लिए जिम्मेदार ठहराया था। बाद में फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (एफएसएल) ने सुसाइड नोट की लिखावट की पुष्टि भी कर दी। याची के अधिवक्ता ने दलील दी गई कि घटना से दो-तीन दिन पहले उसका मृतक से कोई संपर्क नहीं था। इसलिए आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण का आरोप नहीं बनता।
कोर्ट ने कहा कि सुसाइड नोट इस मामले का महत्वपूर्ण साक्ष्य है। ऐसे में आरोपों की सत्यता, आरोपी की मंशा और आत्महत्या से उसके संबंध का अंतिम परीक्षण केवल ट्रायल के दौरान ही किया जा सकता है। कोर्ट ने माना कि प्रथम दृष्टया आरोप तय करने के लिए पर्याप्त सामग्री मौजूद है और आरोपी की आपराधिक अपील खारिज कर दी।