इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम की धारा 20 के तहत जुर्माना और दंडात्मक कार्रवाई केवल तभी की जा सकती है, जब संबंधित अधिकारी ने जानबूझकर या बिना किसी ठोस कारण के सूचना देने में देरी की हो। यह टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने केंद्रीय सूचना आयोग की ओर से आईपीएस शैलेश कुमार यादव पर सूचना देने में देरी पर लगाए गए जुर्माना व अनुशासनात्मक कार्यवाही के आदेश को रद्द कर दिया। यह आदेश न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने दिया है।
गाजियाबाद में आईपीएस अधिकारी याची शैलेश कुमार यादव क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय में क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी के रूप में तैनात थे। साथ ही वह उस दौरान सूचना अधिकारी का पदभार संभाल रहे थे। इस दौरान एक व्यक्ति ने उनसे पासपोर्ट के संबंध में जन सूचना अधिकार के तहत कुछ जानकारी मांगी थी। हालांकि निर्धारित समय में सूचना नहीं दी जा सकी। मामला केंद्रीय सूचना आयोग तक पहुंच गया। तत्कालीन सूचना आयुक्त ने वर्ष 2006-2007 में याची पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगा दिया और अनुशासनात्क कार्यवाही किए जाने का भी आदेश दिया। इस फैसले को याची अधिकारी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
याची अधिवक्ता ने दलील दी कि याची पर बिना किसी ठोस आधार के पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर अधिकतम 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया है। यह भी दलील दी कि विभाग ने आंतरिक जांच रिपोर्ट में यह माना है कि पासपोर्ट कार्यालय में कर्मचारियों की भारी कमी और कार्यभार की अधिकता थी। इस वजह से सूचना सही समय पर नहीं दी जा सकी। विभाग की जांच रिपोर्ट का आयोग ने संज्ञान नहीं लिया। अन्य कई दलीलें भी दी।