याची अधिवक्ता ने दलील दी कि याची पर बिना किसी ठोस आधार के पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर अधिकतम 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया है। यह भी दलील दी कि विभाग ने आंतरिक जांच रिपोर्ट में यह माना है कि पासपोर्ट कार्यालय में कर्मचारियों की भारी कमी और कार्यभार की अधिकता थी। इस वजह से सूचना सही समय पर नहीं दी जा सकी। विभाग की जांच रिपोर्ट का आयोग ने संज्ञान नहीं लिया। अन्य कई दलीलें भी दी।
कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद कहा कि सूचना आयोग ने बिना मुख्य पासपोर्ट अधिकारी की रिपोर्ट का इंतजार किए जल्दबाजी में फैसला सुनाया। आयोग की ओर से अधिकारी के खिलाफ इस्तेमाल की गई भाषा और उन्हें "असभ्य नौकरशाह" कहना पक्षपात को दर्शाता है। सुप्रीम कोर्ट के नजीरों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल अनजाने में हुई देरी या प्रशासनिक बाधाओं के लिए कठोर दंडात्मक सिफारिशें नहीं की जा सकतीं। इसी के साथ अदालत ने आयोग के 8 फरवरी 2007 और 19 मार्च 2007 के आदेशों को पूरी तरह निरस्त कर दिया और याचिका स्वीकार कर ली।