इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि लगान जमा करने से कोई व्यक्ति संपत्ति का आसामी (स्थायी किरायेदार) नहीं बन जाता। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकल पीठ ने देवी दयाल की ओर से कानपुर नगर महापालिका (अब केडीए) के खिलाफ दाखिल 45 साल पुरानी अपील खारिज कर दी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि लगान जमा करने से कोई व्यक्ति संपत्ति का आसामी (स्थायी किरायेदार) नहीं बन जाता। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकल पीठ ने देवी दयाल की ओर से कानपुर नगर महापालिका (अब केडीए) के खिलाफ दाखिल 45 साल पुरानी अपील खारिज कर दी। हालांकि, यह कानूनी लड़ाई साल 1971 में शुरू हुई थी।
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याची का दावा था कि वह नगर महापालिका की भूमि पर बतौर किरायेदार खेती करता है। लगान भी जमा करता है। लिहाजा, उसे जमीन से बेदखल न किया जाए। इस पर नगर महापालिका की ओर से दलील दी गई कि याची को केवल एक साल के लिए जमीन लाइसेंस पर दी गई थी। तय अवधि खत्म होने के बाद जमीन पर कब्जा अवैध है। लिहाजा, याची को जमीन छोड़नी होगी।
कोर्ट ने पाया कि याची ने खुद को आसामी साबित करने के लिए कोई ठोस दस्तावेज पेश नहीं किया। याची ने शुरू में खुद को किरायेदार बताया था पर बाद में आसामी अधिकारों की बात करने लगा, जो कानूनन गलत है। कोर्ट ने कहा कि मूलवाद में जिन तथ्यों का हवाला दिया गया है, उसे अपील के स्तर पर बदला नहीं जा सकता।
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यदि किसी व्यक्ति को एक निश्चित अवधि के लिए लाइसेंस दिया गया है और वह अवधि समाप्त हो चुकी है तो उसके बाद उसका कब्जा केवल अतिक्रमण कहलाता है। याची कानूनी सुरक्षा का हकदार नहीं रह जाता। -इलाहाबाद हाईकोर्ट