इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मैनपुरी के 16 साल पुराने हिरासत में मौत के मामले में राज्य सरकार और पुलिस की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताई है। कोर्ट ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को निर्देश दिया है कि वह 60 दिन में घटना से जुड़ी वीडियोग्राफी, फोटोग्राफ्स और अन्य महत्वपूर्ण साक्ष्य सुरक्षित कर कोर्ट के समक्ष पेश करे।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस चरण पर सीबीआई को एफआईआर दर्ज करने की आवश्यकता नहीं है। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ एसोसिएशन फॉर एडवोकेसी एंड लीगल इनिशिएटिव्स की ओर से दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। मामला 2009 में मैनपुरी के दन्नाहार थाने में दिव्यांग युवक नाहर सिंह की संदिग्ध मौत से जुड़ा है।
पुलिस का दावा था कि युवक ने लॉकअप में बेल्ट से फांसी लगाकर आत्महत्या की थी, जबकि याचिका में इसे संदिग्ध बताया गया। कोर्ट ने कहा कि लॉकअप जैसी निगरानी वाली जगह पर खासकर एक शारीरिक रूप से दिव्यांग व्यक्ति की ओर से आत्महत्या करने की बात प्रथम दृष्टया विश्वसनीय नहीं लगती। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गले पर गांठ के निशान हैं। आशंका है कि युवक की पहले गला घोंटकर हत्या की गई और बाद में शव को लटकाया गया। वीडियोग्राफी और तस्वीरें को प्रस्तुत न किया जाना संस्थागत विफलता
कोर्ट ने टिप्पणी की कि 2010 से लंबित इस जनहित याचिका में अब तक वीडियोग्राफी और तस्वीरें को प्रस्तुत न किया जाना संस्थागत विफलता दर्शाता है। अदालत ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की जांच पर भी असंतोष जताया। कहा कि आयोग ने स्वतंत्र जांच नहीं की और यह भी स्पष्ट नहीं किया कि उसने किन साक्ष्यों के आधार पर आत्महत्या का निष्कर्ष निकाला। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को सीबीआई को प्रतिवादी बनाने का निर्देश भी दिया है। मामले की अगली सुनवाई 10 अगस्त को होगी।