इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि विवाह के दौरान जन्मे बच्चे की वैधता को साधारण शंकाओं के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने पति की ओर से बच्ची की डीएनए जांच की मांग में दायर याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि डीएनए टेस्ट का आदेश देना कोई रुटीन प्रक्रिया नहीं है। इसका आदेश केवल उन ही स्थितियों में ही दिया जाना चाहिए, जहां यह सिद्ध हो कि पति-पत्नी के बीच संबंध की कोई संभावना नहीं थी। यह आदेश न्यायमूर्ति चवन प्रकाश की एकल पीठ ने दिया है।
वाराणसी निवासी रामराज पटेल की शादी 15 अप्रैल 2008 को हुई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि पत्नी शादी के बाद केवल एक सप्ताह ही उनके साथ रही। अधिकांश समय मायके में रहती रही। 17 दिसंबर 2012 को जन्मी बच्ची उनकी संतान नहीं है। इसी आधार पर उन्होंने ट्रायल कोर्ट में बच्ची की डीएनए टेस्ट कराने की अर्जी दी थी। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट और बाद में सत्र न्यायाधीश ने अर्जी खारिज कर दी। इसके बाद रामराज ने हाईकोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण अर्जी दायर की।कोर्ट ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम के अनुसार वैध विवाह से जन्मा बच्चा पति की ही वैध संतान माना जाता है, जब तक कि यह ठोस रूप से साबित न कर दिया जाए कि गर्भधारण की अवधि में पति-पत्नी का संपर्क ही असंभव था।