इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि बिना किसी ठोस कारण के पति से अलग रह रही पत्नी भरण-पोषण की हकदार नहीं है। कोर्ट ने यह टिप्पणी करते हुए पति-पत्नी के विवाद में पारिवारिक न्यायालय की ओर से पत्नी को भरण पोषण देने का आदेश रद्द कर दिया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि बिना किसी ठोस कारण के पति से अलग रह रही पत्नी भरण-पोषण की हकदार नहीं है। कोर्ट ने यह टिप्पणी करते हुए पति-पत्नी के विवाद में पारिवारिक न्यायालय की ओर से पत्नी को भरण पोषण देने का आदेश रद्द कर दिया। यह आदेश न्यायमूर्ति सुभाष चंद्र शर्मा ने विपुल अग्रवाल की निगरानी याचिका पर दिया।
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मेरठ निवासी याची के खिलाफ भरण पोषण की मांग करते हुए उससे अलग रह रही पत्नी ने पारिवारिक न्यायालय में वाद दायर किया था। इस पर न्यायालय ने पत्नी के पक्ष में आदेश देते हुए आठ हजार रुपये मासिक भत्ता तय की। याची ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि पत्नी निशा विवाह के कुछ समय बाद ही छोटे बच्चे के साथ ससुराल छोड़कर मायके में रहने लगी। पति ने उसे वापस लाने के लिए कई प्रयास किए लेकिन वह नहीं मानी। मध्यस्थता के दौरान भी पत्नी ने पति के साथ जाने से मना कर दिया। वे बिना किसी वाजिब कारण पति से अलग रह रही है। ऐसे में आठ हजार रुपये मासिक भरण पोषण सहानुभूति के आधार पर तय कर प्रावधानों का उल्लंघन है। हाईकोर्ट ने पति की निगरानी याचिका स्वीकार करते परिवार न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया और मामले को फिर से निर्णय के लिए उसे परिवार न्यायालय मेरठ भेज दिया।