हाईकोर्ट की खंडपीठ पश्चिमी यूपी में बनाने की मांग कितनी जायज है इसका निर्णय हाईकोर्ट जजों की कमेटी करेगी। कमेटी शीघ्र ही इस मसले पर अपनी राय पूर्व विधिमंत्री के पत्र के जवाब में केंद्र सरकार को भेजेगी। चीफ जस्टिस डॉ. डीवाई चंद्रचूड से मिलकर लौटे प्रतिनिधि मंडल ने यह जानकारी आम सभा को दी। वकीलों को मुख्य न्यायाधीश की ओर से मिले इस जवाब के बाद हड़ताल खत्म करने को लेकर मंगलवार को कोई निर्णय नहीं हो सका। आम सभा बुधवार को इस पर मसले पर फिर से विचार करेगी।
लगभग 40 वकीलों का प्रतिनिधि मंडल मंगलवार को मुख्य न्यायाधीश से मिला। प्रतिनिधि मंडल में शामिल पूर्व मंत्री अनिल तिवारी के मुताबिक कि चीफ जस्टिस ने बताया कि मंत्री रविशंकर प्रसाद द्वारा भेजा गया पत्र रिमाइंडर है। इससे पूर्व मई 2013 में कांग्रेस सरकार ने एक पत्र भेजा था जिसका हाईकोर्ट से कोई जवाब नहीं दिया गया। 25 अगस्त 2014 को रविशंकर प्रसाद ने उसी का स्मरण पत्र भेजा है। उन्होंने इस मामले पर सीनियर जज जस्टिस विनीत सरन की अध्यक्षता में समिति बना दी है।
जस्टिस विनीत सरन ने प्रतिनिधि मंडल को बताया कि समिति की अभी तक कोई बैठक नहीं हुई है। उन्होंने आश्वासन दिया है कि हाईकोर्ट बार को भरोसे में लिए बिना कोई रिपोर्ट चीफ जस्टिस को नहीं दी जाएगी। चीफ जस्टिस ने प्रतिनिधि मंडल को आश्वस्त किया कि राज्य सरकार की ओर से बेंच बनाने को लेकर उनके समक्ष कोई प्रस्ताव नहीं आया है। इस स्थिति में बेंच की स्वीकृति देने का कोई औचित्य नहीं है। प्रतिनिधिमंडल से वार्ता के समय न्यायमूर्ति राकेश तिवारी, न्यायमूर्ति वीके शुक्ला, न्यायमूर्ति अरुण टंडन, न्यायमूर्ति दिलीप गुप्ता, न्यायमूर्ति एपी साही, न्यायमूर्ति विक्रमनाथ और न्यायमूर्ति एसके गुप्ता भी मौजूद थे।
आम सभा को प्रतिनिधिमंडल के अन्य सदस्यों आईके चतुर्वेदी, राधाकांत ओझा आदि ने भी संबोधित किया। इसके बाद अध्यक्ष राकेश पांडेय ने सदस्यों से हड़ताल के संबंध में राय जाननी चाही मगर आम सभा का कोई स्पष्ट मत प्राप्त नहीं हुआ। बहुत से सदस्य हड़ताल जारी रखने के पक्ष में थे। इसलिए तय किया गया कि हड़ताल सात जनवरी को भी जारी रहेगी तथा सदस्य लिखित रूप से अपनी राय देंगे जिसके आधार पर आगे की रणनीति तय की जाएगी।
चीफ जस्टिस से पूर्व विधि मंत्री के पत्र पर वार्ता करने गए प्रतिनिधि मंडल ने पूरी सावधानी बरतते हुए बातचीत का पूरा ब्यौरा लिखित रूप में प्रस्तुत किया। सदस्यों ने कुछ प्रश्न ज्ञापन में शामिल किए थे जिनका मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों की ओर से स्पष्ट उत्तर आया। बैठक के बाद वार्ता का पूरा ब्यौरा फिर से तैयार किया गया जिसमें न्यायाधीशों की ओर से हुई वार्ता भी शामिल की गई। अध्यक्ष राकेश पांडेय ने बताया कि मीटिंग के मिनट्स की प्रति न्यायाधीशों को भी भेजी गई है।
हाईकोर्ट की बेंच बनाने का प्रस्ताव पूर्व में तीन बार हाईकोर्ट द्वारा ही खारिज किया जा चुका है। वह भी तब जब उत्तराखंड इस राज्य का हिस्सा था। उत्तराखंड के विभाजन के बाद स्थितियां काफी बदली हैं फिर ऐसे में खंडपीठ पर पुनर्विचार का औचित्य क्यों है। हाईकोर्ट के अधिवक्ता और पूर्व महासचिव अनिल तिवारी यह सवाल उठाते हैं। वर्ष 1966 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एनयू बेग ने मेरठ में खंडपीठ बनाने का प्रस्ताव ठुकरा दिया था। इसी प्रकार से 1967 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश वीजी ओख ने भी आगरा या मेरठ में सर्किट बेंच बनाने का प्रस्ताव खारिज कर दिया था। इसी प्रकार से 1978 में तत्कालीन चीफ जस्टिस सतीश चंद्रा ने भी खंडपीठ बनाने से इंकार कर दिया था। अनिल तिवारी कहते हैं कि जब हाईकोर्ट तीन बार प्रस्ताव को खारिज कर चुका है तो इस पर फिर से विचार की भी आवश्यकता नहीं बनती है।