फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

High Court : आधिकारिक अधिकार पत्र के बगैर चेकिंग को ड्यूटी मानना गलत, कंडक्टर को हाईकोर्ट से राहत

Fri, 13 Mar 2026 11:53 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि निरीक्षक आधिकारिक अधिकार पत्र के बगैर बस की चेकिंग करते हैं तो उसे ड्यूटी नहीं माना जा सकता। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना की एकल पीठ ने चेकिंग के दौरान निरीक्षकों से मारपीट मामले में ट्रायल कोर्ट से मिली तीन साल की सजा रद्द कर आरोपी 77 वर्षीय कंडक्टर राजेंद्र कुमार को बरी कर दिया।
विज्ञापन
इलाहाबाद हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि निरीक्षक आधिकारिक अधिकार पत्र के बगैर बस की चेकिंग करते हैं तो उसे ड्यूटी नहीं माना जा सकता। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना की एकल पीठ ने चेकिंग के दौरान निरीक्षकों से मारपीट मामले में ट्रायल कोर्ट से मिली तीन साल की सजा रद्द कर आरोपी 77 वर्षीय कंडक्टर राजेंद्र कुमार को बरी कर दिया।

मामला 1981 का है। राजेंद्र सहारनपुर-हरिद्वार मार्ग पर बस लेकर जा रहे थे। रास्ते में रोककर तीन निरीक्षकों ने बस की चेकिंग शुरू कर दी। इस बीच राजेंद्र और निरीक्षकों के बीच मारपीट हो गई। निरीक्षकों ने उनके खिलाफ सरकारी कार्य में बाधा डालने व अन्य आरोप में एफआईआर दर्ज कराई। ट्रायल कोर्ट ने राजेंद्र को दोषी पाते हुए तीन साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई तो उन्होंने फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी।

कोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम नियमावली-1972 के नियमों के अनुसार बस में यात्रियों से टिकट मांगने या चेकिंग करने की शक्ति केवल अधिकृत कर्मचारी के पास ही होती है। अभियोजन पक्ष ने ऐसा कोई अथॉरिटी लेटर या फ्लाइंग स्क्वाड से संबंधित दस्तावेज पेश नहीं किया, जो उनकी मौजूदगी को उस समय वैध ठहराता हो। ऐसे में अधिकार पत्र के बगैर चेकिंग के दौरान विवाद को लोक सेवक को उसके कर्तव्य से रोकने के दायरे में नहीं लाया जा सकता। साथ ही चिकित्सकीय साक्ष्यों और गवाहों के बयानों में भी विसंगतियां पाई गईं। अंततः अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष अपना मामला संदेह से परे साबित करने में विफल रहा।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें